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आत्माओं का संग्राहक (The Spirit Collector)
एक रहस्यमयी बूढ़ा... जिसकी झोपड़ी में सैकड़ों काँच की बोतलें थीं। हर बोतल में कैद थी एक बेचैन आत्मा... और हर आत्मा के पीछे छिपा था एक भयानक सच।
भारत और नेपाल की सीमा से लगे पहाड़ों के बीच एक सुनसान रास्ता था, जहाँ शाम ढलते ही लोग सफ़र करना छोड़ देते थे। उस रास्ते पर न कोई ढाबा था, न कोई गाँव, न कोई मंदिर। केवल घना जंगल और धुंध से ढकी हुई पहाड़ियाँ।
लेकिन उसी जंगल के बीच एक टूटी-फूटी लकड़ी की झोपड़ी थी।
दिन में वह साधारण दिखाई देती थी, पर रात होते ही उसकी खिड़कियों से सैकड़ों नीली और हरी रोशनियाँ चमकने लगती थीं। दूर से देखने पर लगता था मानो झोपड़ी के भीतर हजारों जुगनू उड़ रहे हों।
स्थानीय लोग उसे "आत्माओं वाले बाबा की कुटिया" कहते थे।
कोई उनका असली नाम नहीं जानता था।
बस इतना जानते थे कि अगर किसी की मृत्यु के बाद उसकी आत्मा भटकने लगे, तो वह बूढ़ा उसे ढूँढ़कर काँच की एक बोतल में कैद कर लेता था।
लोग कहते थे कि वह ऐसा दुनिया की रक्षा के लिए करता है।
कुछ लोग कहते थे कि वह आत्माओं का व्यापारी है।
और कुछ का दावा था कि वह मौत का सबसे पुराना सेवक है।
मुंबई की खोजी पत्रकार मीरा अवस्थी अलौकिक घटनाओं पर लेख लिखने के लिए मशहूर थी। उसे भूत-प्रेत पर विश्वास नहीं था, लेकिन उसे उन कहानियों के पीछे छिपे इंसानी सच में दिलचस्पी थी।
एक दिन उसे एक गुमनाम पत्र मिला।
उसमें सिर्फ़ इतना लिखा था—
"अगर जानना चाहती हो कि मरने के बाद आत्माएँ कहाँ जाती हैं... तो पूर्णिमा की रात पुराने देवदार वाले जंगल में आना। लेकिन अगर बाबा तुम्हें एक बोतल थमा दें... तो उसे कभी मत खोलना।"
मीरा ने इसे अपनी ज़िंदगी की सबसे बड़ी स्टोरी मान लिया।
कैमरा, रिकॉर्डर और नोटबुक लेकर वह निकल पड़ी।
गाँव पहुँचने पर उसने सबसे पहले वहाँ के बुज़ुर्गों से बात की।
एक बूढ़ी महिला ने काँपते हुए कहा—
"बेटी, बाबा बुरे नहीं हैं।"
"फिर लोग उनसे डरते क्यों हैं?"
"क्योंकि जिनकी आत्मा वह पकड़ लेते हैं...
वे दोबारा किसी सपने में भी दिखाई नहीं देते।"
पूर्णिमा की रात मीरा जंगल के भीतर पहुँची।
धुंध इतनी घनी थी कि हाथ आगे बढ़ाने पर भी दिखाई नहीं देता था।
कुछ देर बाद उसे वही झोपड़ी दिखाई दी।
दरवाज़ा पहले से खुला था।
अंदर एक दुबला-पतला बूढ़ा बैठा था।
सफेद दाढ़ी, गहरी झुर्रियाँ और आँखें... जिनमें अजीब-सी शांति थी।
उसके पीछे लकड़ी की अलमारियों में सैकड़ों काँच की बोतलें रखी थीं।
हर बोतल के भीतर हल्की-सी नीली रोशनी तैर रही थी।
कुछ बोतलें फुसफुसा रही थीं।
कुछ रो रही थीं।
और कुछ बिल्कुल शांत थीं।
बूढ़े ने बिना उसकी ओर देखे कहा—
"तुम देर से आई हो, मीरा।"
मीरा चौंक गई।
"आप मेरा नाम कैसे जानते हैं?"
वह मुस्कुराया।
"जो आत्माओं को सुन सकता है...
उसे इंसानों के नाम याद रखने की ज़रूरत नहीं पड़ती।"
मीरा ने कैमरा चालू किया।
"क्या सच में इन बोतलों में आत्माएँ कैद हैं?"
बूढ़े ने एक छोटी बोतल उठाई।
उसके भीतर धुएँ जैसा एक प्रकाश घूम रहा था।
"यह आठ साल का बच्चा था।
नदी में डूब गया।
अपनी माँ को छोड़ नहीं पा रहा था।
हर रात घर लौट आता था।
उसकी माँ धीरे-धीरे पागल हो रही थी।
मैंने इसे यहाँ लाकर शांति दी।"
बोतल के भीतर की रोशनी धीरे-धीरे स्थिर हो गई।
जैसे वह उसकी बात सुन रही हो।
फिर उसने दूसरी बोतल दिखाई।
इस बार अंदर की रोशनी लाल थी।
बोतल अपने आप हिल रही थी।
"इसे मत छूना।"
"क्यों?"
"यह आत्मा नहीं...
घृणा है।
जिस आदमी ने अपने पूरे परिवार की हत्या की, उसकी मृत्यु के बाद उसका क्रोध किसी आत्मा से भी अधिक शक्तिशाली हो गया।
अगर यह बाहर आ गया...
तो जहाँ जाएगा, वहाँ नफ़रत फैल जाएगी।"
मीरा के हाथ काँपने लगे।
अचानक झोपड़ी के बाहर किसी ने ज़ोर से दरवाज़ा खटखटाया।
ठक... ठक... ठक...
बूढ़े ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।
मीरा ने पूछा—
"कौन है?"
बूढ़ा बोला—
"जो मर चुके हैं...
वे हमेशा अंदर आना चाहते हैं।"
दरवाज़ा अपने आप खुल गया।
बाहर एक आदमी खड़ा था।
उसके कपड़े फटे हुए थे।
चेहरे पर गहरे घाव थे।
लेकिन सबसे डरावनी बात यह थी कि उसके पैरों के नीचे कोई परछाईं नहीं थी।
वह मुस्कुराया।
"बाबा...
मुझे भी जगह चाहिए।"
बूढ़ा धीरे-धीरे उठा।
उसने अपनी जेब से एक खाली काँच की बोतल निकाली।
फिर आँखें बंद करके कोई प्राचीन मंत्र पढ़ने लगा।
अचानक उस आदमी का शरीर धुएँ में बदलने लगा।
वह दर्द से चीखने लगा।
"नहीं!
मैं अभी नहीं जाना चाहता!"
कुछ ही सेकंड में वह पूरी तरह सिकुड़कर उस बोतल के भीतर समा गया।
बोतल का ढक्कन अपने आप बंद हो गया।
मीरा ने अपनी आँखों से वह सब देखा जो विज्ञान कभी समझा नहीं सकता था।
"आप यह सब क्यों करते हैं?"
बूढ़े ने गहरी साँस ली।
"क्योंकि हर आत्मा को मुक्ति नहीं मिलती।
कुछ अपनी नफ़रत से बंधी होती हैं।
कुछ लालच से।
कुछ बदले से।
अगर उन्हें खुला छोड़ दिया जाए...
तो दुनिया जीवित लोगों की नहीं रहेगी।"
उसी समय मीरा की नज़र एक कोने में रखी पुरानी बोतल पर पड़ी।
वह बाकी सभी से अलग थी।
उसके भीतर की रोशनी काली थी।
और उसके चारों ओर लोहे की सात जंजीरें लिपटी थीं।
"उसमें क्या है?"
बूढ़े का चेहरा पहली बार गंभीर हो गया।
"उसे मत देखो।"
"लेकिन..."
"वह आत्मा नहीं है।"
"तो क्या है?"
बूढ़े ने धीमी आवाज़ में कहा—
"वह मृत्यु से भी पुरानी एक सत्ता है।"
मीरा के भीतर का पत्रकार जाग चुका था।
जैसे ही बूढ़ा बाहर गया, उसने उस बोतल को ध्यान से देखा।
अंदर कोई चेहरा नहीं था।
सिर्फ़ दो लाल आँखें।
अचानक वे आँखें उसकी तरफ़ घूम गईं।
एक धीमी आवाज़ उसके दिमाग में गूँजी—
**"मुझे आज़ाद कर दो।
मैं तुम्हें हर सच बता दूँगा।"**
मीरा पीछे हट गई।
आवाज़ फिर आई—
"तुम्हारे पिता की मौत...
दुर्घटना नहीं थी।"
मीरा का दिल ज़ोर से धड़कने लगा।
यह बात दुनिया में सिर्फ़ वही जानती थी।
"मैं सब बता दूँगा...
बस ढक्कन खोल दो।"
उसी समय बाबा वापस आ गए।
उन्होंने चीखकर कहा—
"पीछे हटो!"
उन्होंने अपनी छड़ी ज़मीन पर मारी।
पूरी झोपड़ी में तेज़ सफेद रोशनी फैल गई।
काली बोतल शांत हो गई।
बाबा ने पहली बार अपनी कहानी सुनाई।
"सैकड़ों साल पहले मैं भी तुम्हारी तरह सच जानना चाहता था।
मैंने इसी बोतल को खोला था।
उस दिन पूरी एक बस्ती जल गई।
हज़ारों लोग मारे गए।
मैंने अपनी पत्नी...
अपने बेटे...
सब खो दिए।"
उनकी आँखों में आँसू भर आए।
"तब से मैं इसकी रखवाली कर रहा हूँ।
जब तक मैं जीवित हूँ...
यह बाहर नहीं आएगा।"
लेकिन उसी रात भयंकर तूफ़ान आया।
बिजली झोपड़ी पर गिरी।
अलमारियाँ गिरने लगीं।
दर्जनों बोतलें टूट गईं।
नीली रोशनियाँ हवा में उड़ने लगीं।
भटकी हुई आत्माएँ चारों ओर फैल गईं।
काली बोतल की जंजीरें भी टूटने लगीं।
बाबा ने मीरा की ओर देखा।
"सुनो...
अगर यह बाहर निकला...
तो दुनिया में कोई तांत्रिक...
कोई मंदिर...
कोई प्रार्थना इसे रोक नहीं पाएगी।"
उन्होंने काली बोतल अपने सीने से लगा ली।
फिर मुस्कुराए।
"कुछ जेलें...
कैदियों के साथ ही दफ़न होनी चाहिए।"
यह कहकर वे जलती हुई झोपड़ी के सबसे भीतर चले गए।
मीरा चीखती रह गई।
कुछ ही क्षणों में पूरी झोपड़ी आग की लपटों में घिर गई।
एक भयानक विस्फोट हुआ।
और फिर...
सब कुछ शांत हो गया।
सुबह गाँव वाले वहाँ पहुँचे।
झोपड़ी पूरी तरह राख बन चुकी थी।
बाबा का कोई निशान नहीं मिला।
न कोई बोतल।
न कोई शव।
बस राख के बीच एक छोटी-सी खाली काँच की शीशी पड़ी थी।
मीरा उसे उठाने लगी।
तभी उसके कानों में एक परिचित आवाज़ आई—
"उसे यहीं छोड़ दो।"
उसने पीछे मुड़कर देखा।
वहाँ कोई नहीं था।
उस घटना के बाद मीरा ने अपनी पूरी रिपोर्ट कभी प्रकाशित नहीं की।
उसने केवल इतना लिखा—
"कुछ सच्चाइयाँ दुनिया को बचाने के लिए छिपी रहनी चाहिए।"
वर्षों बाद भी, पहाड़ों से गुजरने वाले चरवाहे दावा करते हैं कि घनी धुंध वाली रातों में जंगल के भीतर फिर वही झोपड़ी दिखाई देती है।
खिड़कियों में नीली रोशनियाँ टिमटिमाती हैं।
और दरवाज़े पर वही बूढ़ा बैठा होता है।
उसके हाथ में अब भी एक खाली काँच की बोतल होती है।
मानो वह किसी नई भटकी हुई आत्मा का इंतज़ार कर रहा हो।
और अगर कभी कोई अनजान मुसाफ़िर उस झोपड़ी के बहुत करीब चला जाए...
तो उसे धीमी-सी फुसफुसाहट सुनाई देती है—
"हर आत्मा को कैद नहीं किया जाता... कुछ आत्माओं से पूरी दुनिया को बचाया जाता है।"
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