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Hostel में रात को दरवाजा अपने आप खुलता था

 


होस्टल की उस पुरानी बिल्डिंग में हमेशा एक अजीब सा सन्नाटा रहता था। दिन में तो सब सामान्य लगता था—छात्रों की आवाजें, हंसी, पढ़ाई की भागदौड़—लेकिन रात होते ही जैसे पूरा माहौल बदल जाता था।

आरव को वहां आए अभी सिर्फ दो हफ्ते हुए थे। नया शहर, नया कॉलेज और नया होस्टल। सब कुछ थोड़ा अजीब तो लग रहा था, लेकिन उसने इसे सामान्य समझकर नजरअंदाज कर दिया था।

लेकिन तीसरी रात कुछ ऐसा हुआ जिसने उसकी नींद हमेशा के लिए तोड़ दी।

रात करीब 2:15 बजे का समय था।

आरव को अचानक हल्की सी आवाज सुनाई दी—“चर्र…”

उसने नींद में करवट बदली और सोचा शायद हवा होगी।

लेकिन फिर वही आवाज।

इस बार और साफ।

उसने धीरे से आंखें खोलीं।

कमरे का दरवाजा… धीरे-धीरे अपने आप खुल रहा था।

आरव एकदम सतर्क हो गया।

दरवाजा पूरी तरह नहीं खुला था, बस कुछ इंच खुला था और बाहर गलियारे में हल्की पीली लाइट जल रही थी।

आरव ने धीरे से पूछा—
“कौन है?”

कोई जवाब नहीं आया।

उसने उठकर दरवाजे की तरफ देखा… बाहर कोई नहीं था।

उसने सोचा शायद हवा का असर होगा, और दरवाजा बंद कर दिया।

लेकिन जैसे ही वह वापस बिस्तर पर गया, दरवाजा फिर से… “चर्र…”

खुद-ब-खुद खुल गया।

अब आरव के हाथ-पैर ठंडे पड़ गए।

अगली रात उसने तय किया कि वह सोएगा नहीं।

वह बिस्तर पर बैठा रहा, मोबाइल में टाइम देखता रहा।

2:00 बजे…

2:10 बजे…

और फिर 2:15 बजे।

ठीक उसी समय।

दरवाजा फिर से हिला।

धीरे-धीरे खुलने लगा।

आरव ने तुरंत उठकर लाइट जलाई।

पूरा कमरा रोशनी से भर गया।

दरवाजा आधा खुला था।

लेकिन इस बार बाहर गलियारे में कुछ अलग था।

एक परछाई।

बहुत हल्की, लेकिन साफ दिखाई देने वाली।

आरव ने हिम्मत करके बाहर देखा।

कोई नहीं था।

परछाई भी नहीं।

उस रात वह पूरी तरह सो नहीं पाया।

अगले दिन उसने अपने रूममेट से पूछा।

“क्या तुम्हारे कमरे में भी रात को दरवाजा खुलता है?”

रूममेट ने हंसकर कहा—
“तू भी नई अफवाहों में आ गया क्या? यहां कोई ऐसा कुछ नहीं होता।”

लेकिन उसी रात, आरव ने देखा…

दरवाजा सिर्फ उसके कमरे का नहीं, बल्कि सामने वाले कमरे का भी धीरे-धीरे खुल रहा था।

अब यह सिर्फ उसका कमरा नहीं था।

पूरा होस्टल।

आरव ने वार्डन को बताया।

वार्डन ने बात टाल दी—
“पुरानी बिल्डिंग है, हवा लगती होगी।”

लेकिन एक बात उसने भी धीरे से कही—
“बस रात 2 बजे दरवाजा मत खोलना।”

यह सुनकर आरव चुप हो गया।

अब डर curiosity में बदल चुका था।

अगली रात उसने तय किया—वह देखेगा कि 2:15 बजे होता क्या है।

वह दरवाजे के पास बैठ गया।

लाइट बंद।

कमरा पूरी तरह अंधेरा।

2:00 बजे…

2:10 बजे…

उसका दिल तेज धड़क रहा था।

2:15 बजे।

दरवाजा धीरे-धीरे खुला।

लेकिन इस बार आरव ने तुरंत उसे पकड़ लिया।

उसने दरवाजा रोक दिया।

और फिर उसने सुना—

बाहर से किसी की फुसफुसाहट।

“तुमने हमें देर से आने दिया…”

आरव जम गया।

उसने धीरे से पूछा—
“कौन है?”

कोई जवाब नहीं।

लेकिन फिर आवाज आई—
“हम वही हैं… जो कभी यहां रहते थे।”

आरव के हाथ कांपने लगे।

उसने दरवाजा जोर से खोला।

और बाहर देखा—

गलियारा खाली था।

लेकिन अब एक चीज बदल चुकी थी।

गलियारे की दीवार पर पुराने छात्रों के नाम लिखे थे… और उनमें से एक नाम वही था जो आरव के बैच का नहीं था।

बल्कि बहुत पुराना था।

कई साल पहले का।

अगले दिन उसने पुराने रिकॉर्ड चेक किए।

और उसे पता चला—

उस होस्टल में एक हादसा हुआ था… सालों पहले। रात के ठीक 2:15 बजे।

और उसके बाद से…

हर नए छात्र को वही दरवाजा दिखता था।

आरव चुप था।

अब उसे समझ आ गया था—

दरवाजा अपने आप नहीं खुलता था…

वह सिर्फ उन्हें दिखता था, जिन्हें कुछ “अधूरा” समझना बाकी था।

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