महल के नीचे छिपा भूतिया रहस्य

 

महल के नीचे छिपा भूतिया रहस्य

राजगढ़ महल में सूरज ढलने के बाद कोई नहीं जाता था।

गांव वालों को लोगों को रोकने के लिए पहरेदारों, चेतावनी बोर्ड या लोहे के दरवाजों की जरूरत नहीं पड़ती थी। डर ही सबसे बड़ा ताला था। पहाड़ी पर खड़ा वह वीरान महल दूर से किसी मरे हुए राजा के टूटे मुकुट जैसा दिखता था। उसकी दीवारें समय से काली पड़ चुकी थीं, खिड़कियां खाली आंखों जैसी लगती थीं और बेलों ने उसे चारों तरफ से जकड़ रखा था।

दिन में कभी-कभी कुछ पर्यटक महल के बाहर तक आते, तस्वीरें खींचते और गांव वालों की कहानियों पर हंसते। लेकिन शाम होते ही सबसे बहादुर गाइड भी उस जगह के पास रुकने से इनकार कर देता।

लोग कहते थे कि वह महल अब इंसानों का नहीं रहा।

वे कहते थे कि राजघराने की बेचैन आत्माएं उसके खाली गलियारों में चलती हैं।

वे कहते थे कि जिन कमरों में अब कोई नहीं रहता, वहां रात में संगीत बजता है।

वे कहते थे कि रानी आज भी महल के फर्श के नीचे रोती है।

आरव इन बातों पर विश्वास नहीं करता था।

वह एक युवा डॉक्यूमेंट्री फिल्ममेकर था और ऐसी जगहों को फिल्माना पसंद करता था जिनसे लोग डरते थे। डर उसे व्यूज देता था। रहस्य उसे पहचान देता था। भूतिया कुएं, शापित किले, वीरान अस्पताल, पुराने खंडहर—वह सब जगह जा चुका था। उसका चैनल इसलिए तेज़ी से बढ़ा था क्योंकि वह उन जगहों में कदम रखता था जिनके बारे में बाकी लोग सिर्फ बातें करते थे।

जब उसने राजगढ़ महल और उसके नीचे बने गुप्त सुरंगों की कहानी सुनी, तो उसे लगा कि उसे अपनी अगली बड़ी कहानी मिल गई।

उसका कैमरामैन कबीर शुरुआत से ही इस आइडिया के खिलाफ था।

“यह महल सत्तर साल से खाली पड़ा है,” कबीर ने कैमरा बैग उठाते हुए कहा। “और लोग कहते हैं कि नीचे से चीखें आती हैं। तुम्हें यह नॉर्मल लगता है?”

आरव हंसा। “मुझे यह परफेक्ट कंटेंट लगता है।”

कबीर जंग लगे गेट के पास रुक गया। “मैं मजाक नहीं कर रहा।”

“मैं भी नहीं। एक रात महल के अंदर, और बाहर एक वायरल एपिसोड।”

महल का गेट आधा खुला था, जैसे वह उनका इंतजार कर रहा हो।

अंदर आंगन सूखे पत्तों से ढका था। रास्ते के दोनों तरफ टूटी हुई मूर्तियां खड़ी थीं। उनके चेहरे टूट चुके थे, आंखें गायब थीं। बीच में एक पुराना फव्वारा था, जिसमें पानी की जगह बारिश का गंदा पानी और मरे हुए कीड़े भरे थे। ऊपर महल की बालकनियां उन्हें ऐसे देख रही थीं जैसे वे किसी पुराने अपराध की गवाह हों।

आरव ने कैमरा ऑन किया।

“आज रात हम राजगढ़ महल में प्रवेश कर रहे हैं,” उसने कैमरे की तरफ देखते हुए कहा। “एक ऐसा राजमहल, जिसे एक रहस्यमयी नरसंहार के बाद छोड़ दिया गया था। स्थानीय कहानियों के अनुसार, इस महल के नीचे गुप्त सुरंगें हैं, जहां राजघराने की बेचैन आत्माएं भटकती हैं। लोग कहते हैं कि मृत लोग कभी यहां से गए ही नहीं। आज हम जानेंगे कि इस महल के नीचे असल में क्या छिपा है।”

कैमरे के पीछे से कबीर ने धीरे से कहा, “या फिर हम पता लगाते-लगाते मर जाएंगे।”

आरव ने उसकी बात अनसुनी कर दी।

वे मुख्य हॉल में पहुंचे। हर चीज पर धूल जमी थी। फटे हुए परदे बिना हवा के हिल रहे थे। दीवारों पर राजाओं और रानियों के बड़े-बड़े चित्र टंगे थे, लेकिन नमी ने उनके चेहरे खराब कर दिए थे। एक चित्र में लाल घूंघट वाली रानी थी, जिसके गले में हीरे का हार था। उसकी आंखें अजीब तरह से जीवित लग रही थीं।

आरव ने टॉर्च ऊपर उठाई। “यह रानी देवयानी होंगी।”

कबीर ने कैमरा ज़ूम किया। “वही रानी जो गायब हो गई थीं?”

“हां,” आरव बोला। “कहानी कहती है कि राजा ने उन पर विश्वासघात का आरोप लगाया था। फिर एक ही रात में पूरा राजपरिवार गायब हो गया। नौकरों को महल में खून मिला, लेकिन कोई लाश नहीं मिली।”

कबीर ने कैमरा नीचे किया। “और तुम फिर भी नीचे जाना चाहते हो?”

आरव मुस्कुराया। “अब तो और ज्यादा।”

उन्होंने तीन घंटे तक महल छाना। उन्हें टूटे कमरे, चमगादड़ों से भरे गलियारे, पुराने हथियार, टूटे आईने और एक पूजा कक्ष मिला, जहां भगवान की मूर्ति के पास ताजे गेंदे के फूल रखे थे।

कबीर फूल देखकर जम गया।

“ताजे फूल,” उसने कहा। “यह किसने रखे?”

आरव ने एक फूल छूकर देखा। वह सूखा नहीं था।

“शायद गांव वाले चुपके से पूजा करने आते हों।”

“रात में?”

तभी फर्श के नीचे से आवाज आई।

धीमी दस्तक।

फिर दूसरी।

फिर तीन और।

कबीर पीछे हट गया। “मुझे बताओ कि तुमने भी सुना।”

आरव की आंखों में उत्साह चमक उठा। “बेसमेंट।”

वे आवाज का पीछा करते हुए पुराने सिंहासन कक्ष तक पहुंचे। कमरे के अंतिम हिस्से में शाही सिंहासन अब भी रखा था, पूरी तरह धूल से ढका हुआ। उसके पीछे दीवार पर एक फीका पड़ चुका चित्र बना था जिसमें राजगढ़ महल अपने सुनहरे समय में दिखाई दे रहा था—हाथी, सैनिक, नर्तकियां, संगीतकार और रानी के पैरों के पास बना एक छोटा-सा चिह्न।

आरव ने उसी चिह्न को रानी के चित्र में भी देखा था—एक गोल घेरे में कमल।

उसने दीवार पर बने कमल को दबाया।

पत्थर कराह उठा।

सिंहासन के पास का फर्श धीरे-धीरे खिसक गया।

नीचे अंधेरी सीढ़ियां दिखाई दीं।

ठंडी हवा नीचे से ऊपर आई। उसमें सीलन, लोहे और बहुत पुराने सड़ चुके इतिहास की गंध थी।

कबीर फुसफुसाया, “नहीं। बिल्कुल नहीं।”

आरव ने कैमरा उठाया। “यही है।”

दोनों नीचे उतर गए।

सीढ़ियां उम्मीद से ज्यादा गहरी थीं। उनकी टॉर्चों की रोशनी काले पत्थर की दीवारों पर पड़ी। दीवारों पर अजीब राजसी चिह्न बने थे। कुछ चित्र युद्ध दिखाते थे। कुछ धार्मिक अनुष्ठान। कुछ में लोग घूंघट वाली रानी के सामने घुटनों के बल झुके थे।

नीचे पहुंचकर वे एक चौड़ी सुरंग में आ गए।

हवा भारी थी।

कबीर का ऑडियो रिकॉर्डर अचानक खड़खड़ाने लगा।

स्टैटिक के बीच एक स्त्री की आवाज फुसफुसाई—

“राजा को मत जगाओ।”

कबीर के हाथ से रिकॉर्डर गिरते-गिरते बचा।

आरव ने उसे पकड़कर फिर सुना। पहले स्टैटिक। फिर सन्नाटा। फिर वही आवाज—

“राजा को मत जगाओ।”

आरव की मुस्कान गायब हो गई।

पहली बार उसे यह जगह कंटेंट नहीं लगी। यह चेतावनी जैसी लगी।

फिर भी वे आगे बढ़े।

सुरंग आगे जाकर तीन रास्तों में बंट गई। एक रास्ते से पानी की गंध आ रही थी। दूसरे से गर्म हवा। तीसरे से हल्का संगीत।

आरव ने संगीत वाला रास्ता चुना।

हर कदम के साथ संगीत साफ होता गया। घुंघरुओं की आवाज। तबले की थाप। सितार की धुन। एक औरत की गायकी, जिसकी भाषा गांव की भाषा से भी पुरानी लग रही थी। सुरंग अचानक एक बड़े भूमिगत कक्ष में खुल गई।

उनकी टॉर्चों ने नीचे छिपा शाही नृत्य कक्ष दिखाया।

संगमरमर के खंभे कतारों में खड़े थे। दीवारों पर आईने लगे थे, जिनमें से ज्यादातर टूट चुके थे। फर्श के बीच गोल डिजाइन बना था, जिस पर गहरे भूरे रंग का दाग था।

कबीर ने कैमरा फर्श पर किया। “यह खून है?”

आरव झुका और दाग को छुआ। दाग पत्थर में बहुत गहराई तक समा चुका था।

तभी आईने चमक उठे।

बिजली से नहीं।

यादों से।

हर टूटे आईने में नर्तकियां दिखाई देने लगीं। रेशमी कपड़ों में शाही महिलाएं एक साथ नाच रही थीं। दीवारों के पास संगीतकार बैठे थे। सेवक दीपक पकड़े खड़े थे। बीच में रानी देवयानी अकेली नाच रही थीं—सुंदर, शांत और बेहद दुखी।

फिर दृश्य बदल गया।

सैनिक नृत्य कक्ष में घुस आए।

संगीत रुक गया।

राजा अंदर आया।

उसका चेहरा सुनहरे मुकुट की छाया में छिपा था, लेकिन उसका क्रोध पूरे कमरे को भर रहा था।

उसने रानी की तरफ उंगली उठाई।

आईने कांपने लगे।

आरव ने राजा की आवाज सुनी—गहरी और निर्दयी।

“विश्वासघाती।”

रानी ने सिर ऊंचा किया।

“मैंने तुम्हारे राज्य को तुमसे बचाया है।”

राजा ने तलवार निकाल ली।

आईने काले पड़ गए।

कक्ष में एक चीख गूंज गई।

कबीर पीछे लड़खड़ा गया। “हमें यहां से निकलना चाहिए।”

आरव हिल नहीं पा रहा था। “यह भूतिया दृश्य नहीं था। यह याद थी।”

तभी किसी ठंडी चीज ने उसके गले को छुआ।

वह मुड़ा।

उसके पीछे एक औरत खड़ी थी।

लाल घूंघट। हीरे का हार। पीला, सुंदर और दुख से टूटा चेहरा।

रानी देवयानी।

आरव की सांस रुक गई।

कबीर ने धीरे से मंत्र बुदबुदाया।

रानी ने आरव की ओर देखा। उसके होंठ नहीं हिले, लेकिन आवाज सीधे उसके मन में आई।

“सुरंगें खून याद रखती हैं। महल झूठ याद रखता है। जीवित लोगों को सच याद रखना होगा।”

आरव ने हिम्मत करके पूछा, “यहां क्या हुआ था?”

रानी ने एक हाथ उठाया।

कक्ष बदल गया।

अचानक आरव और कबीर अतीत में खड़े थे।

उन्होंने राजा रुद्र देव को देखा—राजगढ़ का शासक, जो शक्ति और अमरता के जुनून में पागल हो चुका था। उसने महल के नीचे सुरंगें भागने के लिए नहीं, बल्कि काले अनुष्ठानों के लिए बनवाई थीं। वह मानता था कि राजसी खून जीवन और मृत्यु के बीच रास्ता खोल सकता है।

रानी देवयानी को उसका रहस्य पता चल गया।

राजा ने पहले कैदियों की बलि दी। फिर नौकरों की। फिर सैनिकों की। जब अनुष्ठान असफल रहा, तो उसने अपने ही परिवार का खून इस्तेमाल करने का फैसला किया।

रानी ने उसे रोकने की कोशिश की। उसने बच्चों को छिपाया और वफादार रक्षकों को संदेश भेजा। लेकिन राजा को पता चल गया। उसने दरबार के सामने रानी पर विश्वासघात का आरोप लगा दिया।

उस रात महल कसाईखाना बन गया।

राजा के सैनिकों ने राजपरिवार के लोगों को सुरंगों में घसीटा। रानी ने उनका मुकाबला किया। वफादार रक्षकों ने लड़ाई की। नौकरों ने बच्चों को गुप्त कमरों में बंद करके बचाने की कोशिश की। भूमिगत कक्षों में खून बहता गया।

अंतिम कक्ष में राजा ने अनुष्ठान पूरा करने की कोशिश की।

लेकिन उससे पहले रानी देवयानी ने उसे शाप दिया।

“अगर तुम्हें मृत्यु की भूख है, तो मृत्यु ही तुम्हें हमेशा के लिए मुकुट पहनाएगी।”

अनुष्ठान उल्टा पड़ गया।

राजा मरा नहीं।

वह उससे भी भयानक चीज बन गया।

सुरंगों ने उसे निगल लिया।

उसके पीड़ित भी उसी के साथ कैद हो गए।

दृश्य खत्म हुआ।

आरव घुटनों के बल गिर गया। उसका शरीर कांप रहा था।

कबीर ने पूछा, “तो राजा अभी भी यहीं है?”

रानी ने सबसे गहरी सुरंग की तरफ देखा।

अंधेरे से एक धीमी गुर्राहट आई।

न जानवर की।

न इंसान की।

दीवारें कांप गईं।

रानी देवयानी की आत्मा झिलमिलाने लगी। “वह महल के नीचे सोता है। सुरंगें उसे बांधे रखती हैं। लेकिन तुमने सिंहासन का द्वार खोल दिया। अब उसने जीवित लोगों की आहट सुन ली है।”

आरव फुसफुसाया, “हम उसे कैसे रोकें?”

रानी ने उसके हाथ में पकड़े कैमरे की तरफ देखा।

“सच को पत्थरों के ऊपर उठना होगा।”

आरव समझ गया। “आप चाहती हैं कि हम दुनिया को सच दिखाएं।”

“सिर्फ इतना काफी नहीं,” रानी बोली। “अंतिम कक्ष में राजमुद्रा है। उसे तोड़ दो, तो कैद आत्माएं मुक्त हो जाएंगी। असफल हुए, तो भोर से पहले राजा महल में लौट आएगा।”

कबीर ने आरव का हाथ पकड़ लिया। “हम और नीचे नहीं जा रहे।”

आरव ने रानी को देखा, फिर अंधेरी सुरंग को। अब उसके चेहरे पर कोई घमंड नहीं था।

“हमने यह शुरू किया है,” उसने कहा। “हमें इसे खत्म करना होगा।”

कबीर ने उसे घूरा। “तुमने शुरू किया है।”

“और अब मैं तुमसे मदद मांग रहा हूं।”

कबीर ने गहरी सांस ली और कैमरा उठाया। “ठीक है। लेकिन अगर मैं मरा, तो तुम्हारे चैनल को मैं ही haunt करूंगा।”

वे रानी की धुंधली रोशनी के पीछे-पीछे सुरंगों में आगे बढ़े।

भूमिगत रास्ते महल से कहीं ज्यादा बड़े थे। कुछ रास्ते हड्डियों से भरे बंद कमरों तक जाते थे। कुछ काले पानी वाले कुओं तक खुलते थे, जिनमें अपने नहीं, अनजान चेहरे दिखाई देते थे। एक गलियारे की दीवारों पर खून से बने सैकड़ों हाथों के निशान थे।

जैसे-जैसे वे गहराई में उतरते गए, आत्माओं का असर बढ़ता गया।

पीछे से बच्चे की हंसी आई।

एक सैनिक छत पर उल्टा रेंगता दिखाई दिया।

एक बिना चेहरे वाला सेवक अचानक सामने आया और उसने आरव को एक छिपे गड्ढे से बचने का संकेत दिया।

हर आत्मा बुरी नहीं थी। कई आत्माएं मुक्त होना चाहती थीं।

लेकिन कुछ अपने दर्द में खुद को भूल चुकी थीं।

एक रास्ते में एक शाही रक्षक ने जंग लगे भाले से उन पर हमला किया। उसकी आत्मिक कवच नीली आग जैसा चमक रहा था। कबीर ने अपने बैग से लोहे की कीलें फेंकीं। आत्मा चीखकर पीछे हट गई। दूसरे गलियारे में बिना आंखों वाली एक औरत ने उनसे आईने में देखने की विनती की। आरव लगभग मान गया था, तभी रानी की आवाज गूंजी—

“मृतकों को अपना चेहरा मत दो।”

आखिरकार वे कमल के चिन्ह से ढके एक पत्थर के दरवाजे तक पहुंचे।

आरव ने धक्का दिया। दरवाजा नहीं खुला।

कबीर ने ऊपर लिखा हुआ देखा। “यह पढ़ सकते हो?”

आरव ने धूल साफ की।

वह धीरे-धीरे बोला, “स्मृति से केवल दोषी डरते हैं।”

दरवाजा खुल गया।

अंदर राजकुमारों और राजकुमारियों का कमरा था।

छोटे बिस्तर दीवारों के साथ लगे थे। लकड़ी के खिलौने वैसे ही पड़े थे। छोटी-छोटी चूड़ियां फर्श पर बिखरी थीं। हवा बहुत शांत थी—इतनी शांत कि वह दुख जैसी लग रही थी।

कमरे के बीच तीन बाल आत्माएं हाथ पकड़कर खड़ी थीं।

सबसे बड़ी लड़की ने आरव से पूछा, “क्या मां ने तुम्हें भेजा है?”

आरव का गला भर आया। “हां।”

“क्या पिता अभी भी नाराज हैं?”

कबीर ने चेहरा फेर लिया।

रानी देवयानी उनके पीछे प्रकट हुईं, पहले से भी कमजोर। बच्चों ने उन्हें देखा और दौड़कर उनसे लिपट गए। एक पल के लिए वह भूमिगत कमरा गर्म रोशनी से भर गया।

तभी महल जोर से कांपा।

बच्चे चीख उठे।

सुरंगों में एक भारी आवाज गूंजी—

“देवयानी।”

रानी का चेहरा कठोर हो गया। “वह जाग गया।”

कमरे के अंतिम हिस्से में फर्श टूट गया और नीचे जाती एक और सीढ़ी दिखाई दी। वहां से गर्म हवा आ रही थी।

आरव, कबीर, रानी और बच्चों की आत्माएं अंतिम स्तर पर उतर गए।

आखिरी सुरंग इंसानों की बनाई नहीं लगती थी। दीवारें पत्थर के भीतर धड़कते मांस जैसी लग रही थीं। राजसी चिह्न दानवी आकारों में बदल चुके थे। हवा में आग और पुराने खून की गंध थी।

अंत में अंतिम कक्ष आया।

बीच में एक गोल गड्ढा था। दीवारों से काली जंजीरें निकलकर नीचे अंधेरे में जाती थीं। गड्ढे के ऊपर एक सुनहरी राजमुद्रा लटक रही थी। वह टूटी हुई थी, फिर भी चमक रही थी। उस पर कमल और राजा का मुकुट बना था।

और उसके नीचे कुछ हिल रहा था।

राजा रुद्र देव गड्ढे से ऊपर उठा।

उसके सिर पर मुकुट था, लेकिन वह उसकी खोपड़ी में धंसा हुआ था। उसके शाही कपड़े जले हुए चिथड़ों की तरह लटक रहे थे। उसकी त्वचा राख जैसी फटी हुई थी। आंखें लाल अंगारों की तरह जल रही थीं। जंजीरें उसके शरीर से बंधी थीं, लेकिन वह ऊपर चढ़ते हुए उन्हें एक-एक कर तोड़ रहा था।

कबीर फुसफुसाया, “यह भूत नहीं है।”

रानी ने कहा, “नहीं। यह राजा के नाम में छिपी भूख है।”

राजा ने आरव की तरफ देखा और मुस्कुराया।

“जीवित खून,” उसने कहा।

आरव का शरीर जम गया। राजा की आवाज उसके मन में घुस गई। उसने आरव को उसके सारे डर दिखाए—असफलता, अकेलापन, भूले जाने का डर, दुनिया में नाम कमाने की भूख।

“मुझे फिल्माओ,” राजा ने फुसफुसाया। “दुनिया को मेरी ताकत दिखाओ। उन्हें मेरा नाम याद दिलाओ।”

आरव ने बिना सोचे कैमरा उठा लिया।

कबीर ने उसे जोर से थप्पड़ मारा।

आरव होश में आया।

“शुक्रिया,” उसने बुदबुदाया।

“बाद में धन्यवाद देना,” कबीर बोला। “पहले राजमुद्रा तोड़ो।”

रानी राजा की ओर बढ़ीं, लेकिन राजा ने जंजीर से उन्हें दूर फेंक दिया। बच्चों की आत्माएं चीख पड़ीं। कक्ष में तूफान उठ गया।

आरव राजमुद्रा की तरफ भागा।

राजा गरजा और जंजीरें खींचने लगा। एक जंजीर टूटी। फिर दूसरी। सुरंग से आत्माएं दौड़ती हुई आईं—रक्षक, नौकर, नर्तकियां, कैदी—सब उसे रोकने की कोशिश कर रहे थे। राजा उन्हें लाल आग से जला रहा था, लेकिन वे पीछे नहीं हट रहे थे।

कबीर सब रिकॉर्ड कर रहा था और चिल्ला रहा था, “आरव, जल्दी!”

आरव राजमुद्रा तक पहुंचा। वह गड्ढे के ऊपर लटक रही थी। उसने टूटे खंभे पर चढ़ने की कोशिश की। उसका पैर फिसला, हाथ कट गया, लेकिन वह फिर ऊपर चढ़ा।

राजा ने उसे देख लिया।

“सच राज्य को आजाद नहीं करता,” रुद्र देव गुर्राया। “शक्ति करती है।”

आरव चिल्लाया, “तो फिर तुम अब तक जमीन के नीचे कैद क्यों हो?”

उसने अपना ट्राइपॉड हथौड़े की तरह उठाया और राजमुद्रा पर मारा।

मुद्रा में दरार पड़ी।

राजा चीख उठा।

आरव ने फिर वार किया।

मुद्रा फट गई, लेकिन टूटी नहीं।

राजा अपनी अंतिम जंजीर तोड़कर उस पर झपटा।

रानी देवयानी उनके बीच आ खड़ी हुईं।

उन्होंने दोनों हाथों से राजा को रोका। उनकी आत्मा तेज रोशनी से जलने लगी।

“तुमने हमारा घर नष्ट किया,” रानी ने कहा। “अब तुम किसी और दुनिया को नष्ट नहीं करोगे।”

राजा फुफकारा, “तुम मेरी रानी थीं।”

रानी की आवाज गूंज उठी, “मैं कभी तुम्हारी परछाईं नहीं थी।”

आरव ने ट्राइपॉड आखिरी बार उठाया।

कबीर चिल्लाया, “सच के लिए!”

आरव ने पूरी ताकत से राजमुद्रा पर वार किया।

सुनहरा कमल चकनाचूर हो गया।

कक्ष में सफेद रोशनी फट पड़ी।

जंजीरें चमक उठीं। गड्ढा किसी खुले घाव की तरह फैल गया और राजा को नीचे खींचने लगा। रुद्र देव पत्थर पकड़कर चीखता रहा, शाप देता रहा। लेकिन जिन आत्माओं को उसने महल के नीचे दफनाया था, वे सब उसके चारों तरफ खड़ी थीं।

अब वे डर से नहीं, न्याय से उसे देख रही थीं।

रानी देवयानी उसके सामने खड़ी हुईं।

“यह राज्य याद रखता है,” उन्होंने कहा।

राजा गड्ढे में समा गया।

कक्ष शांत हो गया।

फिर सुरंगें हजारों रोशनियों से भर गईं।

बेचैन आत्माएं मुक्त होने लगीं।

सेवक। सैनिक। नर्तकियां। बच्चे। कैदी। राजपरिवार के भूले हुए सदस्य। वे पत्थर की छत से रोशनी बनकर ऊपर उठने लगे, जैसे चिंगारियां आसमान लौट रही हों।

रानी देवयानी ने आरव और कबीर की तरफ देखा।

“तुम कहानी लेने आए थे,” उन्होंने कहा। “सच लेकर जाओ।”

आरव ने कैमरा नीचे किया। “क्या अब आप मुक्त हैं?”

रानी ने अपने बच्चों को देखा। बच्चों ने उनका हाथ पकड़ रखा था।

“आखिरकार।”

वह मुस्कुराईं।

फिर वे रोशनी में विलीन हो गईं।

सुरंगें टूटने लगीं।

आरव और कबीर भागे।

पत्थर उनके पीछे गिर रहे थे। धूल ने उनके फेफड़े भर दिए। रास्ते बदल रहे थे, लेकिन मित्र आत्माएं छोटी-छोटी रोशनी बनकर उन्हें रास्ता दिखाती रहीं। वे सिंहासन कक्ष की सीढ़ियों से ऊपर चढ़े और जैसे ही बाहर निकले, छिपा दरवाजा उनके पीछे हमेशा के लिए बंद हो गया।

सुबह की धूप टूटे महल की खिड़कियों से अंदर आ रही थी।

पहली बार राजगढ़ महल भूतिया से ज्यादा थका हुआ लग रहा था।

कबीर फर्श पर बैठ गया और खांसते हुए बोला, “फुटेज डिलीट करो और शादी-ब्याह की फोटोग्राफी शुरू करो।”

आरव ने कैमरे को देखा।

कैमरे ने सब कुछ रिकॉर्ड किया था।

लेकिन जब उसने फाइलें चेक कीं, तो ज्यादातर अलौकिक दृश्य स्टैटिक में बदल चुके थे। रानी सिर्फ रोशनी जैसी दिख रही थीं। राजा सिर्फ अंधेरा। चीखें हवा जैसी सुनाई दे रही थीं।

फिर भी कैमरे में चित्र, सुरंगें, हड्डियां, राजमुद्रा और शिलालेख रिकॉर्ड थे।

इतना सच काफी था।

आरव ने उस वीडियो को सस्ती डरावनी थंबनेल और झूठे डरावने टाइटल के साथ अपलोड नहीं किया। उसने राजगढ़ के छिपे इतिहास, शाही नरसंहार, भूमिगत कक्षों और पत्थरों पर खुदे नामों पर एक गंभीर डॉक्यूमेंट्री बनाई।

वीडियो रातों-रात वायरल नहीं हुआ।

वह धीरे-धीरे फैलता गया।

इतिहासकार आए। पुरातत्व विभाग आया। सरकार ने जांच के लिए महल को सील कर दिया। पुराने गांव रिकॉर्ड से जुड़े परिवारों को आखिरकार पता चला कि उनके पूर्वजों के साथ क्या हुआ था।

राजगढ़ महल के प्रवेश द्वार पर एक स्मारक लगाया गया।

उस पर भूतों का जिक्र नहीं था।

उस पर नाम लिखे थे।

सैकड़ों नाम।

कई महीनों बाद आरव फिर महल लौटा। पहाड़ी बदली हुई लग रही थी। मजदूरों ने आंगन साफ कर दिया था। फव्वारे में फिर साफ पानी था। रानी देवयानी का चित्र ठीक करके एक छोटे संग्रहालय कक्ष में लगाया गया था।

आरव उस चित्र के सामने खड़ा हुआ।

चित्र में रानी की आंखें अब शांत लग रही थीं।

कबीर उसके पास आया और धीमे से बोला, “तुम्हें लगता है वह चली गईं?”

आरव ने चित्र को देखा।

हॉल में एक हल्की आवाज गूंजी।

घुंघरू।

धीमा संगीत।

फिर सन्नाटा।

आरव मुस्कुराया। “मुझे लगता है, वह आखिरकार घर पहुंच गईं।”

उस शाम जब सूरज राजगढ़ महल के पीछे डूब रहा था, गांव वाले पहाड़ी से भाग नहीं रहे थे। उन्होंने स्मारक के पास दीपक जलाए और मृतकों के नाम लिए।

अब जमीन के नीचे से कोई चीख नहीं उठी।

कोई शाही नगाड़ा सुरंगों में नहीं गूंजा।

कोई रानी फर्श के नीचे नहीं रोई।

लेकिन महल के बहुत नीचे, टूटे पत्थरों और टूटी जंजीरों के पीछे, धूल में एक काला मुकुट अब भी पड़ा था।

टूटा हुआ।

खामोश।

अब किसी राजा का इंतजार नहीं करता हुआ।

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