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चाँदहीन जंगल (The Moonless Forest)
अमावस्या की रात जंगल इंसानों का नहीं... आत्माओं का होता है।
बरसों पहले उत्तर भारत के पहाड़ों के बीच एक ऐसा जंगल हुआ करता था, जिसका नाम लेते ही लोगों की आवाज़ धीमी हो जाती थी। उसे लोग "चाँदहीन जंगल" कहते थे। कहा जाता था कि अमावस्या की रात उस जंगल में चाँद की रोशनी कभी नहीं उतरती। आसमान चाहे बिल्कुल साफ़ क्यों न हो, जंगल के ऊपर हमेशा काला अंधेरा छाया रहता था। गांव के बुज़ुर्ग कहते थे कि उस एक रात जंगल पूरी तरह आत्माओं का हो जाता है। जो इंसान भूल से भी उस सीमा के भीतर चला जाए, वह या तो कभी लौटकर नहीं आता, या लौटता है तो उसकी आँखों में ऐसी दहशत होती है जिसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता।
आर्यन बचपन से ही ऐसी कहानियों को अंधविश्वास मानता था। वह पेशे से वन्यजीव फ़ोटोग्राफ़र था और रहस्यमयी जगहों की तस्वीरें लेने का शौकीन था। इंटरनेट पर वायरल होने वाली डरावनी कहानियों का सच जानना उसका जुनून था। जब उसे चाँदहीन जंगल की कथा सुनने को मिली, तो उसने तय कर लिया कि इस बार अमावस्या की रात वह वहीं बिताएगा। गांव वालों ने लाख समझाया—"बेटा, जंगल दिन में तुम्हारा है, लेकिन अमावस्या की रात नहीं। उस रात वहां किसी और का राज चलता है।" आर्यन मुस्कुराया, कैमरा उठाया और शाम ढलने से पहले जंगल की ओर निकल पड़ा।
सूरज डूबते ही जंगल का रंग बदलने लगा। पेड़ों की शाखाएँ हवा के बिना भी हिल रही थीं। पक्षियों की आवाज़ें अचानक बंद हो गईं। ऐसा लग रहा था जैसे पूरा जंगल किसी अनदेखे आदेश का इंतज़ार कर रहा हो। रात के ठीक बारह बजे आर्यन ने ऊपर देखा। आसमान बिल्कुल खाली था। अमावस्या तो थी ही, लेकिन आश्चर्य की बात यह थी कि तारों की रोशनी भी जंगल के भीतर नहीं पहुँच रही थी। उसके कैमरे की स्क्रीन अपने आप बंद हो गई। मोबाइल का नेटवर्क गायब हो चुका था और कंपास गोल-गोल घूमने लगा। तभी दूर से किसी स्त्री के गाने की धीमी आवाज़ हवा में तैरती हुई आई। आवाज़ इतनी मधुर थी कि डर के बावजूद आर्यन उसके पीछे चल पड़ा।
कुछ दूर जाकर उसे एक खुला मैदान दिखाई दिया। मैदान के बीचों-बीच सैकड़ों सफेद कपड़ों में लोग गोल घेरा बनाकर खड़े थे। वे धीरे-धीरे एक साथ झूम रहे थे, लेकिन उनके पैरों की कोई परछाईं नहीं थी। उनके चेहरे धुंधले थे, जैसे किसी ने उन्हें मिटा दिया हो। अचानक सभी ने एक साथ अपना सिर घुमाकर आर्यन की ओर देखा। उसी पल गाना बंद हो गया। पूरा जंगल भयानक सन्नाटे में डूब गया। फिर उनमें से एक आकृति मुस्कुराई और बिना होंठ हिलाए उसकी आवाज़ सीधे आर्यन के दिमाग में गूँजी—"तुमने हमारी रात में कदम रख दिया है।"
आर्यन भागने लगा, लेकिन जितना तेज़ दौड़ता, उतना ही जंगल गहरा होता जाता। पेड़ अपनी जगह बदल रहे थे। रास्ते गायब हो रहे थे। हर दिशा एक जैसी दिख रही थी। तभी उसे एक पुरानी झोपड़ी दिखाई दी। अंदर एक बूढ़ी औरत दीया जलाकर बैठी थी। उसने बिना ऊपर देखे कहा, "तुम देर से आए हो। जब अमावस्या शुरू होती है, तब जंगल की हर आत्मा जाग जाती है। अब सूर्योदय तक तुम उनके मेहमान हो।" आर्यन ने घबराकर पूछा, "मैं यहाँ से निकल कैसे सकता हूँ?" बूढ़ी औरत ने पहली बार उसकी तरफ देखा। उसकी आँखें पूरी तरह सफेद थीं। "निकल सकते हो... लेकिन उसके लिए किसी आत्मा को अपनी जगह भेजना होगा।"
आर्यन के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। तभी झोपड़ी का दरवाज़ा अपने आप खुल गया। बाहर वही सफेद आकृतियाँ खड़ी थीं। उनमें से एक युवती आगे बढ़ी। उसके चेहरे पर अजीब-सी शांति थी। उसने अपना नाम नैना बताया। उसने कहा कि सौ साल पहले वह भी इसी जंगल में रास्ता भटक गई थी। हर अमावस्या की रात उसकी आत्मा इस जंगल में कैद रहती है। उसने आर्यन से कहा, "अगर तुम मेरी जगह रह जाओ, तो मैं मुक्त हो जाऊँगी। अगर नहीं... तो सूरज निकलने से पहले जंगल खुद अपना शिकार चुन लेगा।"
आर्यन के सामने जीवन और मृत्यु का सबसे कठिन निर्णय था। तभी अचानक पूरे जंगल में ज़मीन काँपने लगी। पेड़ों के बीच से एक विशाल काली परछाईं उभरी। उसका शरीर धुएँ से बना था और उसकी आँखें जलते अंगारों जैसी थीं। गांव वाले जिसे वन-रक्षक आत्मा कहते थे, वह वास्तव में जंगल का शाप था। उसने गरजकर कहा, "हर सौ साल में एक जीवित आत्मा इस जंगल की कीमत चुकाती है।" नैना रोने लगी। उसने आर्यन का हाथ पकड़कर कहा, "भागो... मैं फिर भी यहीं रह लूँगी।" लेकिन आर्यन ने इंकार कर दिया। उसने महसूस किया कि किसी निर्दोष आत्मा को हमेशा के लिए कैद छोड़ देना उससे नहीं होगा।
वह धीरे-धीरे उस काली आत्मा के सामने जाकर खड़ा हो गया। उसने कहा, "अगर किसी एक को रहना ही है, तो मैं रहूँगा।" जैसे ही उसने यह शब्द कहे, पूरा जंगल तेज़ रोशनी से भर गया। हवा में हजारों आत्माओं की चीखें गूँज उठीं। लेकिन तभी कुछ अप्रत्याशित हुआ। नैना ने दौड़कर आर्यन का हाथ पकड़ लिया और बोली, "नहीं! इस जंगल को एक और निर्दोष आत्मा नहीं मिलेगी।" उसने अपने गले में पहना हुआ पुराना ताबीज़ ज़मीन पर फेंक दिया। ताबीज़ टूटते ही उससे निकलने वाली सुनहरी रोशनी पूरे जंगल में फैल गई। वर्षों से कैद आत्माएँ एक-एक करके मुक्त होने लगीं। काली परछाईं दर्द से चीखने लगी। उसके धुएँ जैसा शरीर हवा में बिखरने लगा। पहली बार जंगल के ऊपर सुबह की हल्की किरण दिखाई दी।
जब आर्यन की आँख खुली, वह जंगल के बाहर पड़ा था। गांव वाले उसे घेरकर खड़े थे। उसके कैमरे में एक ही तस्वीर बची थी—एक मुस्कुराती हुई लड़की, जिसके पीछे सफेद धुंध में डूबा जंगल दिखाई दे रहा था। लेकिन गांव वालों ने तस्वीर देखते ही डर के मारे कैमरा गिरा दिया। उन्होंने काँपती आवाज़ में कहा, "यह नैना है... वह लड़की जो सौ साल पहले अमावस्या की रात जंगल में गायब हो गई थी।"
उस घटना के बाद चाँदहीन जंगल बदल गया। लोग कहते हैं कि अब अमावस्या की रात भी वहाँ हवा पहले जैसी डरावनी नहीं लगती। फिर भी गांव के बुज़ुर्ग आज तक एक चेतावनी दोहराते हैं—"अगर अमावस्या की रात जंगल के भीतर कोई मीठा गीत सुनाई दे, तो पीछे मुड़कर मत देखना। क्योंकि हर आत्मा मुक्त नहीं हुई... कुछ अब भी किसी नए मुसाफ़िर का इंतज़ार कर रही हैं।"
वर्षों बाद भी आर्यन हर अमावस्या की रात एक ही सपना देखता था। घने अंधेरे जंगल में दूर कहीं एक लड़की मुस्कुराते हुए खड़ी होती, फिर धीरे-धीरे धुंध में खो जाती। और उसके बाद वही फुसफुसाहट सुनाई देती—"जंगल कभी पूरी तरह खाली नहीं होता... बस उसका मालिक बदलता रहता है।"
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