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अदृश्य गांव
(एक रहस्यमयी, रोमांचक, प्रेम और हॉरर से भरी कहानी)
रात के लगभग ग्यारह बज चुके थे। आसमान में बादल इस तरह उमड़ रहे थे जैसे किसी अनजाने तूफ़ान की तैयारी हो रही हो। घने जंगल के बीच एक संकरी कच्ची सड़क पर अपनी पुरानी जीप चलाते हुए आरव बार-बार मोबाइल का नेटवर्क देखने की कोशिश कर रहा था। वह पेशे से एक ट्रैवल फ़ोटोग्राफ़र था और भारत के सबसे रहस्यमयी स्थानों की तस्वीरें लेने के लिए मशहूर था। इस बार उसे पहाड़ों के बीच बसे एक पुराने मंदिर की तस्वीरें लेने जाना था, लेकिन रास्ता भटकने के बाद वह पूरी तरह अकेला पड़ चुका था।
बारिश अचानक इतनी तेज़ हुई कि जीप की हेडलाइट भी मुश्किल से कुछ मीटर आगे तक दिखा रही थी। तभी उसकी जीप झटके से बंद हो गई। उसने कई बार स्टार्ट करने की कोशिश की, लेकिन इंजन ने जवाब दे दिया।
"कमाल है... अब यही बाकी था," उसने बड़बड़ाते हुए कहा।
चारों तरफ़ सन्नाटा था। न कोई इंसान, न कोई घर, केवल जंगल की अजीब आवाज़ें। अचानक उसे दूर कहीं हल्की-सी रोशनी दिखाई दी।
पहले तो उसे लगा कि शायद कोई ढाबा होगा, लेकिन जब उसने ध्यान से देखा तो रोशनी धीरे-धीरे बढ़ती जा रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे पूरा कोई गांव अंधेरे में चमक रहा हो।
आरव ने अपना कैमरा उठाया और रोशनी की तरफ़ चल पड़ा।
करीब बीस मिनट बाद वह एक विशाल लकड़ी के फाटक के सामने खड़ा था। ऊपर पुराने पत्थर पर सुनहरे अक्षरों में लिखा था—
"स्वागत है... देवग्राम में।"
अंदर कदम रखते ही उसे ऐसा लगा जैसे वह किसी दूसरी दुनिया में आ गया हो।
गांव बेहद सुंदर था।
मिट्टी के घर, लालटेन की पीली रोशनी, साफ़ गलियां, मंदिर की घंटियां, बच्चों की हंसी और लोगों के चेहरों पर अजीब-सी शांति।
लेकिन एक बात अजीब थी।
गांव में किसी के पास मोबाइल नहीं था। बिजली नहीं थी। हर कोई पुराने समय के कपड़े पहने हुए था।
एक बूढ़ा आदमी मुस्कुराते हुए उसके पास आया।
"बेटा... रास्ता भूल गए हो?"
आरव ने राहत की सांस ली।
"जी... मेरी गाड़ी जंगल में खराब हो गई है।"
बूढ़ा मुस्कुराया।
"जो यहां आता है... वह हमेशा रास्ता भूलकर ही आता है।"
आरव ने उस वाक्य पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया।
उसे गांव के सबसे बड़े घर में ठहराया गया।
वहीं उसकी मुलाकात हुई मीरा से।
मीरा की बड़ी-बड़ी आंखें, लंबे काले बाल और बेहद शांत मुस्कान थी। उसे देखकर आरव कुछ पल के लिए सब कुछ भूल गया।
"आप शहर से आए हैं?" मीरा ने पूछा।
"हाँ... दिल्ली से।"
"दिल्ली..."
उसने ऐसा कहा जैसे उसने पहली बार यह नाम सुना हो।
आरव को अजीब लगा।
रात के खाने में पूरे गांव के लोग इकट्ठा हुए।
सब लोग बेहद विनम्र थे लेकिन उनकी आंखों में एक रहस्य छिपा हुआ था।
जब खाना खत्म हुआ तो गांव के मुखिया ने कहा—
"कल सूरज निकलने से पहले गांव से बाहर मत निकलना।"
"क्यों?"
मुखिया कुछ पल चुप रहा।
"क्योंकि अंधेरे में जंगल इंसानों का नहीं रहता।"
पूरी सभा अचानक शांत हो गई।
आरव को लगा शायद यह गांव की कोई पुरानी मान्यता होगी।
लेकिन रात में उसकी नींद अचानक खुल गई।
उसे लगा जैसे बाहर कोई रो रहा हो।
उसने खिड़की से झांका।
सामने सड़क पर दर्जनों सफेद कपड़ों में लोग धीरे-धीरे चलते दिखाई दिए।
उनके पैर ज़मीन को छू भी नहीं रहे थे।
आरव घबरा गया।
उसने कैमरा उठाया।
जैसे ही फोटो लेने लगा...
सभी चेहरे उसकी तरफ़ घूम गए।
उनकी आंखें पूरी तरह काली थीं।
आरव डरकर पीछे हट गया।
सुबह जब उसने मीरा को यह बात बताई तो वह कुछ देर चुप रही।
फिर बोली—
"अगर उन्होंने तुम्हें देख लिया है... तो अब तुम्हारे पास ज़्यादा समय नहीं है।"
"मतलब?"
"आज रात के बाद वे तुम्हें लेने आएंगे।"
आरव हंस पड़ा।
"तुम मज़ाक कर रही हो?"
मीरा की आंखों में आंसू आ गए।
"काश मैं मज़ाक कर रही होती।"
उसने पहली बार गांव का असली रहस्य बताया।
लगभग सौ साल पहले इस पूरे इलाके में भयानक महामारी फैली थी।
एक-एक करके सारे गांव खत्म हो गए।
लेकिन देवग्राम के लोगों ने गांव छोड़ने से इंकार कर दिया।
उन्होंने गांव बचाने के लिए एक प्राचीन तांत्रिक अनुष्ठान किया।
अनुष्ठान सफल तो हुआ...
लेकिन कीमत बहुत बड़ी थी।
पूरा गांव समय से बाहर चला गया।
अब यह गांव केवल हर सौ साल में एक रात के लिए दिखाई देता था...
और केवल उन्हीं लोगों को जो पूरी तरह रास्ता भटक चुके होते थे।
जो यहां आता...
वह वापस कभी पहले जैसा नहीं लौटता।
आरव हंस नहीं पाया।
उसे पहली बार एहसास हुआ कि गांव में किसी भी घर में कैलेंडर नहीं था।
किसी को आज की तारीख नहीं पता थी।
उसने अपना मोबाइल निकाला।
स्क्रीन पर तारीख देखकर उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
फोन पर वर्ष लिखा था—
1926
"यह कैसे हो सकता है?"
मीरा बोली—
"समय यहां वैसा नहीं चलता जैसा बाहर।"
आरव को विश्वास नहीं हुआ।
उसने गांव छोड़ने की कोशिश की।
लेकिन जैसे ही वह फाटक तक पहुंचा...
उसे वही रास्ता बार-बार वापस गांव में ले आता।
घंटों कोशिश करने के बाद भी वह गांव से बाहर नहीं निकल सका।
रात होते-होते गांव का माहौल बदलने लगा।
लालटेन अपने आप बुझने लगीं।
मंदिर की घंटियां बिना किसी के बजने लगीं।
आसमान पूरी तरह लाल हो गया।
तभी पूरे गांव में एक आवाज़ गूंजी—
"समय पूरा हुआ..."
जंगल से हजारों परछाइयां गांव की ओर बढ़ने लगीं।
वे इंसान नहीं थीं।
उनके चेहरे बिना आंखों के थे।
हाथ असामान्य रूप से लंबे।
और शरीर धुएं की तरह।
गांव वाले घबराए नहीं।
जैसे वे इस रात का इंतजार कर रहे हों।
मुखिया ने आरव से कहा—
"भागो!"
"किधर?"
"मंदिर।"
आरव और मीरा मंदिर की तरफ़ दौड़ पड़े।
पीछे से वे परछाइयां उनका पीछा कर रही थीं।
मंदिर के अंदर पहुंचते ही दरवाजा अपने आप बंद हो गया।
अंदर एक विशाल पत्थर का दर्पण रखा था।
मीरा बोली—
"यही गांव की आत्मा है।"
"क्या करना होगा?"
"किसी एक को अपनी यादें इसमें छोड़नी होंगी।"
"यादें?"
"जो भी अपनी सारी यादें इस दर्पण को देगा... वह गांव को अगले सौ साल तक बचा देगा।"
आरव चुप हो गया।
अगर उसने ऐसा किया...
तो वह अपने माता-पिता, अपने बचपन, अपने जीवन...
सब कुछ भूल जाएगा।
मीरा उसकी तरफ़ देख रही थी।
"मैं कर दूंगी।"
आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।
"नहीं।"
मीरा मुस्कुराई।
"मैं पहले ही सौ साल से यहां हूं।"
आरव सन्न रह गया।
"क्या?"
"मैं उस रात मर चुकी थी।"
उसकी आंखों से आंसू बहने लगे।
"मैं केवल गांव की याद हूं।"
आरव का दिल टूट गया।
वह पहली बार समझ पाया कि वह जिस लड़की से प्यार करने लगा था...
वह जीवित नहीं थी।
बाहर मंदिर के दरवाजे टूटने लगे।
परछाइयां अंदर आने ही वाली थीं।
आरव ने बिना कुछ सोचे अपना हाथ दर्पण पर रख दिया।
दर्पण चमक उठा।
उसकी सारी यादें धीरे-धीरे उससे निकलने लगीं।
बचपन...
मां...
पिता...
दोस्त...
सपने...
सब धुंधले होते गए।
मीरा रोती रही।
"मत करो..."
लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी।
अचानक पूरा गांव तेज़ रोशनी से भर गया।
सारी काली परछाइयां चीखती हुई राख बन गईं।
मंदिर शांत हो गया।
धीरे-धीरे गांव गायब होने लगा।
घर...
पेड़...
लोग...
सब हवा में घुलने लगे।
आखिरी बार मीरा उसके सामने आई।
"अगर कभी फिर रास्ता भूल जाओ..."
"तो शायद हम फिर मिलेंगे।"
उसने आरव के माथे को छुआ।
और वह भी धुंध में बदल गई।
...
सुबह जंगल में कुछ चरवाहों ने एक युवक को बेहोश पाया।
वह आरव था।
उसके पास कैमरा था।
लेकिन कैमरे में केवल एक तस्वीर बची थी।
एक लड़की की मुस्कुराती हुई तस्वीर।
पीछे लिखा था—
"देवग्राम – 1926"
आरव को अपना नाम तक याद नहीं था।
वह कौन था...
कहां से आया...
कुछ याद नहीं।
सिर्फ़ एक अजीब-सी उदासी उसके दिल में हमेशा रहती।
वर्षों बाद उसकी वह तस्वीर दुनिया भर में मशहूर हो गई।
हजारों लोगों ने दावा किया कि उन्होंने भी उसी लड़की को अपने सपनों में देखा है।
कुछ यात्रियों ने बताया कि घने जंगल में भटकने के बाद उन्हें एक ऐसा गांव दिखाई दिया था, जहां समय रुक गया था। लेकिन जब वे सुबह लौटे, वहां केवल घास, टूटे पत्थर और वीरानी थी।
पुराने इतिहासकारों ने जब सरकारी अभिलेख खंगाले, तो पता चला कि उस इलाके में सचमुच देवग्राम नाम का एक गांव हुआ करता था। सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार, वह गांव महामारी में 1926 में पूरी तरह समाप्त हो गया था। उसके बाद वहां कभी कोई बस्ती नहीं बसी।
लेकिन स्थानीय बुज़ुर्ग आज भी एक चेतावनी देते हैं—
"यदि किसी अमावस्या की रात तुम जंगल में रास्ता भूल जाओ, और दूर कहीं लालटेन की पीली रोशनी दिखाई दे... तो उस रोशनी की ओर कभी मत जाना। क्योंकि वह कोई साधारण गांव नहीं होता। वह अदृश्य गांव होता है... जो केवल हर सौ साल में एक बार उन लोगों के लिए प्रकट होता है, जो हमेशा के लिए खो जाने वाले होते हैं। और वहां से लौटकर आने वाला इंसान कभी वैसा नहीं रहता, जैसा पहले था।"
उस रात के बाद से जंगल में कई खोजी दल गए, आधुनिक उपकरणों, ड्रोन और उपग्रहों के साथ। किसी को कुछ नहीं मिला। लेकिन कभी-कभी रात के गहरे सन्नाटे में हवा के साथ एक धीमी आवाज़ आज भी सुनाई देती है—
"स्वागत है... देवग्राम में..."
और फिर सब कुछ वैसा ही शांत हो जाता है, मानो वह गांव कभी अस्तित्व में था ही नहीं। शायद वह केवल एक कहानी हो... या शायद वह अगली बार किसी ऐसे मुसाफ़िर का इंतज़ार कर रहा हो, जो अपने जीवन का रास्ता खो चुका हो।
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