रुद्र कुंड का श्राप
(The Curse of Rudra Kund)
मध्य भारत के घने साल और सागौन के जंगलों के बीच एक रहस्यमयी जलाशय था, जिसे लोग रुद्र कुंड के नाम से जानते थे। दिन के समय उसका पानी शीशे की तरह शांत और निर्मल दिखाई देता था, लेकिन जैसे ही सूर्य पश्चिम के पहाड़ों के पीछे छिपता, उसका रंग गहरे काले शीशे जैसा हो जाता। जंगल में रहने वाली जनजातियाँ मानती थीं कि सूर्यास्त के बाद उस कुंड में कोई मनुष्य स्नान करे, तो उसके शरीर में एक ऐसे योद्धा की आत्मा प्रवेश कर जाती है जो लगभग आठ सौ वर्षों से मुक्ति की प्रतीक्षा कर रही है।
गाँव के बच्चे उस रास्ते पर खेलते तक नहीं थे। बुज़ुर्ग हर शाम कुंड की दिशा में दीपक जलाकर प्रार्थना करते थे। उनका कहना था कि वहाँ रहने वाली आत्मा किसी साधारण भूत की नहीं, बल्कि एक ऐसे वीर सेनापति की थी जिसने अपने राजा के साथ विश्वासघात होने के बाद प्रतिशोध की शपथ ली थी। युद्धभूमि में मरते समय उसने अंतिम साँस लेते हुए कहा था, "जब तक विश्वासघात का अंतिम बीज इस धरती से समाप्त नहीं होगा, मेरी आत्मा किसी न किसी शरीर में लौटती रहेगी।"
सदियाँ बीत गईं, राजवंश समाप्त हो गए, महल खंडहर बन गए, लेकिन रुद्र कुंड का श्राप जीवित रहा।
दिल्ली का युवा पुरातत्व शोधकर्ता आरव लोककथाओं पर विश्वास नहीं करता था। उसे प्राचीन मंदिरों और भूले हुए इतिहास की खोज का शौक था। जब उसने रुद्र कुंड के बारे में पढ़ा तो उसे लगा कि यह किसी पुराने युद्ध से जुड़ी एक कल्पित कहानी होगी। वह कैमरा, ड्रोन और अपने शोध उपकरण लेकर उस जंगल में पहुँचा।
गाँव वालों ने उसे बहुत समझाया। एक वृद्ध पुजारी ने उसकी हथेली पर भस्म लगाते हुए कहा, "बेटा, दिन में जितनी चाहे जाँच कर लेना। लेकिन शाम ढलने के बाद उस जल को हाथ भी मत लगाना। वह पानी नहीं... अधूरी प्रतिज्ञा है।"
आरव मुस्कुरा दिया। उसे लगा कि विज्ञान हर रहस्य का उत्तर दे सकता है।
दिन भर उसने कुंड के आसपास के पत्थरों पर खुदे शिलालेखों की तस्वीरें लीं। उसे एक टूटी हुई तलवार, कुछ प्राचीन सिक्के और युद्ध के प्रतीक मिले। धीरे-धीरे समय का ध्यान ही नहीं रहा। जब उसने घड़ी देखी, तब तक सूरज पहाड़ियों के पीछे उतर चुका था।
जंगल पर अजीब-सी खामोशी छा गई।
उसी समय उसका पैर फिसल गया और वह सीधे रुद्र कुंड में गिर पड़ा।
ठंडा पानी उसके पूरे शरीर में समा गया। वह तुरंत बाहर निकल आया, लेकिन उसे महसूस हुआ कि पानी सामान्य नहीं था। उसकी त्वचा बर्फ जैसी ठंडी हो चुकी थी और कानों में तलवारों की टकराहट, घोड़ों की टापें और युद्ध के नगाड़ों की आवाज़ गूँजने लगी।
उस रात गाँव के अतिथि-गृह में उसे नींद नहीं आई।
आधी रात को उसने सपना देखा कि वह किसी प्राचीन युद्धभूमि में खड़ा है। उसके शरीर पर लोहे का कवच है, हाथ में विशाल तलवार है और सामने हजारों सैनिक खड़े हैं। तभी एक रक्तरंजित योद्धा उसकी ओर बढ़ा। उसकी आँखें अंगारों की तरह जल रही थीं।
उसने कहा, "मैं रुद्रसेन हूँ। मेरा शरीर मर गया, लेकिन मेरा वचन नहीं। अब यह शरीर मेरा है।"
आरव चीखते हुए जाग गया।
लेकिन उसकी आवाज़ उसकी अपनी नहीं थी।
सुबह जब उसने आईने में देखा, तो उसकी आँखों का रंग बदल चुका था। उसकी हथेलियों पर पुराने युद्धचिह्न उभर आए थे। उसे ऐसी प्राचीन भाषा के शब्द याद आने लगे, जिन्हें उसने कभी सीखा ही नहीं था।
धीरे-धीरे उसका स्वभाव बदलने लगा। वह शांत स्वभाव का युवक अब छोटी-सी बात पर क्रोधित हो जाता। उसकी ताकत असाधारण हो गई। एक दिन उसने अकेले ही गिरे हुए विशाल पेड़ को रास्ते से हटा दिया। गाँव वाले भयभीत हो उठे। वे समझ गए कि रुद्र कुंड ने अपना नया पात्र चुन लिया है।
गाँव की शिक्षिका मीरा, जो इतिहास में गहरी रुचि रखती थी, आरव की मदद करना चाहती थी। उसने पुराने मंदिरों और ताड़पत्रों में रुद्रसेन की कथा खोजनी शुरू की। उसे पता चला कि रुद्रसेन कोई अत्याचारी नहीं था। वह अपने राज्य का सबसे ईमानदार सेनापति था। लेकिन उसके ही मित्र ने दुश्मनों से मिलकर विश्वासघात किया। युद्ध हार गया, राजा मारा गया और मरते समय रुद्रसेन की आत्मा प्रतिशोध की अग्नि में बँध गई।
समस्या यह थी कि अब उसे असली विश्वासघाती नहीं मिल सकता था।
इसलिए उसकी आत्मा हर उस मनुष्य को अपना शत्रु समझने लगी थी जिसमें उसे छल या झूठ की हल्की-सी गंध भी महसूस होती।
उधर आरव के भीतर रुद्रसेन का प्रभाव बढ़ता जा रहा था। कभी-कभी वह घंटों के लिए गायब हो जाता और सुबह उसकी तलवार जैसी गहरी चोटों के निशान जंगल के पेड़ों पर मिलते। उसे याद भी नहीं रहता कि रात में वह कहाँ गया था।
एक रात मीरा ने उसका पीछा किया।
उसने देखा कि आरव रुद्र कुंड के किनारे खड़ा किसी अदृश्य सेना से बात कर रहा था। अचानक कुंड का पानी लाल हो गया और उसमें सैकड़ों योद्धाओं की धुँधली आकृतियाँ दिखाई देने लगीं। वे सब रुद्रसेन के आदेश की प्रतीक्षा कर रहे थे।
"युद्ध अभी समाप्त नहीं हुआ," आरव की आवाज़ गूँजी, "विश्वासघाती अभी जीवित हैं।"
मीरा ने साहस करके उसका नाम पुकारा।
कुछ क्षणों के लिए आरव की आँखों में अपनेपन की चमक लौटी।
उसने काँपते हुए कहा, "मुझे बचा लो... वह मेरे भीतर हर दिन और मजबूत हो रहा है।"
मीरा को मंदिर के गर्भगृह में एक प्राचीन शिलालेख मिला। उस पर लिखा था—
"प्रतिशोध से बँधी आत्मा को शस्त्र नहीं, सत्य मुक्त करता है। जिस दिन वह स्वयं स्वीकार करेगी कि युद्ध समाप्त हो चुका है, उसी दिन उसका श्राप टूटेगा।"
पूर्णिमा की रात दोनों रुद्र कुंड पहुँचे। जैसे ही चाँद की रोशनी पानी पर पड़ी, पूरा जंगल युद्धभूमि में बदल गया। हजारों भूतिया सैनिक प्रकट हो गए। रुद्रसेन पूरी शक्ति के साथ आरव के शरीर पर अधिकार कर चुका था।
मीरा उसके सामने निडर होकर खड़ी हो गई।
उसने ऊँची आवाज़ में कहा, "तुमने अपना धर्म निभाया था। विश्वासघात तुम्हारी हार नहीं था। लेकिन आठ सौ वर्षों से तुम निर्दोष लोगों को दंड दे रहे हो। यह वीरता नहीं, अन्याय है।"
कुछ पल के लिए सब शांत हो गया।
रुद्रसेन की आँखों में पहली बार क्रोध की जगह पीड़ा दिखाई दी।
उसी समय कुंड के जल में एक और आकृति उभरी—वह उसके पुराने राजा की आत्मा थी।
राजा ने मुस्कुराकर कहा, "रुद्रसेन, युद्ध उसी दिन समाप्त हो गया था जिस दिन हम मरे। केवल तुमने उसे अपने भीतर जीवित रखा। अब लौट आओ।"
रुद्रसेन घुटनों के बल बैठ गया।
उसकी तलवार धीरे-धीरे धूल में बदलने लगी। उसने आरव के शरीर से बाहर निकलते हुए अंतिम बार आकाश की ओर देखा।
"मैंने अपने वचन को श्राप बना दिया... अब मुझे विश्राम चाहिए।"
उसके शब्द समाप्त होते ही पूरा जंगल तेज़ प्रकाश से भर गया। कुंड का काला पानी फिर से निर्मल हो गया। सदियों से गूँजती युद्ध की आवाज़ें हमेशा के लिए शांत हो गईं।
सुबह जब आरव की आँख खुली, तो उसे कुछ भी याद नहीं था। उसकी हथेलियों के निशान गायब हो चुके थे। गाँव वालों ने पहली बार सूर्यास्त के बाद भी रुद्र कुंड के किनारे भय नहीं, बल्कि शांति महसूस की।
आरव और मीरा शहर लौट आए। उन्होंने इस घटना का उल्लेख किसी शोधपत्र में नहीं किया, क्योंकि उन्हें पता था कि कुछ सच्चाइयाँ प्रमाणों से नहीं, अनुभवों से जीवित रहती हैं।
लेकिन कहानी यहीं समाप्त नहीं हुई।
कई महीनों बाद एक विदेशी पर्यटक उसी जंगल में पहुँचा। चेतावनी के बावजूद उसने सूर्यास्त के बाद रुद्र कुंड में अपना चेहरा धो लिया।
अगली सुबह गाँव वालों ने उसे कुंड के किनारे खड़ा देखा।
वह स्थिर दृष्टि से पानी को देख रहा था।
उसके होंठ धीरे-धीरे हिले।
"रुद्रसेन मुक्त हो गया..."
वह मुस्कुराया।
"...लेकिन इस कुंड की गहराइयों में उससे भी पुरानी एक आत्मा सदियों से जागने की प्रतीक्षा कर रही थी।"
उसी क्षण कुंड का शांत पानी एक बार फिर काला पड़ गया।
और जंगल में युद्ध के नगाड़ों से भी अधिक भयावह... किसी अनजानी हँसी की आवाज़ गूँज उठी।
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