आत्माओं की बनाई गुड़िया

 

आत्माओं की बनाई गुड़िया

(The Doll Made by Spirits)

उत्तर प्रदेश के एक छोटे-से कस्बे चंद्रपुर के किनारे एक पुरानी हवेली थी, जिसके बारे में लोग कहते थे कि वहाँ कभी खिलौने बनाने वाला एक कारीगर रहता था। उसकी बनाई हुई लकड़ी की गुड़ियाएँ इतनी सुंदर होती थीं कि देखने वाला उन्हें खरीदने से खुद को रोक नहीं पाता था। लेकिन एक अमावस्या की रात वह कारीगर रहस्यमय परिस्थितियों में मर गया। उसके बाद हवेली में आग लग गई और उसके साथ उसकी सारी गुड़ियाएँ भी जलकर राख हो गईं।

गाँव वालों का विश्वास था कि वह कारीगर अपनी आखिरी गुड़िया कभी पूरी नहीं कर पाया। कहते हैं कि अधूरी इच्छा और भटकती आत्माओं ने मिलकर उस गुड़िया को पूरा किया। तभी से वह गुड़िया समय-समय पर किसी न किसी घर में दिखाई देती थी। देखने में वह बिल्कुल मासूम लगती थी—लाल फ्रॉक, काँच जैसी नीली आँखें, लंबे सुनहरे बाल और होंठों पर हल्की-सी मुस्कान। लेकिन जो बच्चा उसे अपना दोस्त बना लेता, उसके घर की खुशियाँ धीरे-धीरे खत्म होने लगतीं।


दिल्ली से अपने पैतृक घर लौटे अमित, उनकी पत्नी संध्या और सात साल की बेटी परी ने उस पुराने मकान को खरीद लिया। उन्हें पुराने घरों का शौक था और वे सोचते थे कि थोड़ी मरम्मत के बाद यह हवेली फिर से जीवित हो जाएगी।

सफाई के दौरान परी को अटारी में एक लकड़ी का पुराना संदूक मिला। संदूक खोलते ही धूल का बादल उठा और उसके भीतर वही सुंदर गुड़िया रखी हुई थी।

"पापा, देखिए! कितनी प्यारी गुड़िया है!"

अमित ने हँसते हुए कहा, "अगर पसंद है तो रख लो।"

उन्हें क्या पता था कि उसी क्षण उनके परिवार की सबसे भयानक रातें शुरू हो चुकी थीं।


पहली रात सब सामान्य रहा।

दूसरी रात परी अचानक नींद में मुस्कुराने लगी।

सुबह उसने माँ से कहा—

"मम्मी, इसका नाम गौरी है।"

संध्या ने हैरानी से पूछा, "तुमने इसका नाम रखा?"

परी ने मासूमियत से सिर हिलाया।

"नहीं... इसने खुद बताया।"

संध्या ने इसे बच्चे की कल्पना समझकर बात टाल दी।

लेकिन अगले कुछ दिनों में परी अक्सर अपने कमरे में अकेले बैठकर किसी से बातें करती रहती। जब भी पूछा जाता, वह मुस्कुराकर कहती—

"गौरी मुझे कहानियाँ सुनाती है।"


धीरे-धीरे घर का माहौल बदलने लगा।

रात को बंद कमरों से फुसफुसाहट सुनाई देती।

सीढ़ियों पर छोटे-छोटे कदमों की आवाज़ आती।

रसोई में रखे बर्तन अपने-आप गिर जाते।

लेकिन सबसे अजीब बात यह थी कि हर घटना के समय गुड़िया हमेशा किसी नई जगह पर मिलती।

कभी सोफे पर...

कभी डाइनिंग टेबल पर...

कभी घर के मुख्य दरवाज़े के सामने।

हालाँकि किसी ने उसे वहाँ रखते हुए कभी नहीं देखा।


एक शाम परी ने अचानक अपनी माँ से कहा—

"मम्मी... पापा आपसे झूठ बोलते हैं।"

संध्या चौंक गई।

"किसने कहा?"

परी ने गुड़िया को सीने से लगाते हुए उत्तर दिया—

"गौरी ने।"

संध्या हँस दी।

लेकिन उसी रात उसे अमित के मोबाइल में एक पुरानी महिला मित्र के संदेश दिखाई दिए। बात सामान्य थी, फिर भी उसके मन में संदेह का बीज पड़ चुका था।

उधर गुड़िया हर रात परी से कुछ-न-कुछ कहती रहती।

"तुम्हारी मम्मी तुम्हें प्यार नहीं करती..."

"दादी चाहती हैं कि तुम यहाँ से चली जाओ..."

"तुम्हारे पापा तुमसे ज़्यादा अपने काम से प्यार करते हैं..."

धीरे-धीरे परिवार के हर सदस्य के मन में एक-दूसरे के लिए अविश्वास पैदा होने लगा।


कुछ ही दिनों में घर का वातावरण पूरी तरह बदल गया।

जहाँ पहले हँसी गूँजती थी, वहाँ अब हर दिन झगड़े होने लगे।

अमित छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा करने लगा।

संध्या हर समय बेचैन रहने लगी।

दादी को लगता कि कोई रात भर उनके कमरे में खड़ा उन्हें घूरता रहता है।

और परी...

वह पहले से कहीं अधिक शांत हो गई थी।

अब वह घंटों तक गुड़िया की आँखों में देखती रहती।


एक रात अमित की नींद अचानक खुली।

उसने देखा कि परी अपने कमरे में नहीं थी।

पूरे घर में खोजने के बाद वह उसे अटारी में मिला।

परी फर्श पर चाक से एक गोल घेरा बनाकर उसके बीच बैठी थी।

सामने वही गुड़िया रखी थी।

और परी किसी अनजान भाषा में धीरे-धीरे बोल रही थी।

उसकी आवाज़ सात साल की बच्ची जैसी नहीं लग रही थी।

जैसे कई लोग एक साथ बोल रहे हों।


अगली सुबह अमित ने गुड़िया को घर से बाहर फेंक दिया।

लेकिन जब शाम को वह ऑफिस से लौटा...

गुड़िया फिर से परी के बिस्तर पर बैठी थी।

इस बार उसके होंठों पर पहले से बड़ी मुस्कान थी।


डरकर अमित गाँव के सबसे बुज़ुर्ग व्यक्ति हरिनाथ बाबा के पास पहुँचा।

बाबा ने गुड़िया को देखते ही आँखें बंद कर लीं।

उन्होंने कहा—

"यह किसी इंसान ने नहीं बनाई।

जब पुराना कारीगर मर गया था, उसकी अधूरी रचना को भटकती आत्माओं ने पूरा किया।

यह खिलौना नहीं...

आत्माओं का घर है।

यह किसी को तुरंत नहीं मारती।

पहले पूरे परिवार का विश्वास तोड़ती है।

फिर जब सब एक-दूसरे से नफ़रत करने लगते हैं...

तब यह सबसे छोटे बच्चे की आत्मा को अपना नया साथी बना लेती है।"


उस रात बिजली चली गई।

पूरा घर अंधेरे में डूब गया।

अचानक ऊपर से परी की चीख सुनाई दी।

सभी दौड़कर उसके कमरे में पहुँचे।

कमरे की हर दीवार पर छोटे-छोटे हाथों के निशान बने थे।

गुड़िया हवा में लटकी हुई थी।

उसकी काँच जैसी आँखें अब लाल चमक रही थीं।

और उसकी आवाज़ पूरे कमरे में गूँज रही थी—

"अब यह बच्ची हमारी है।"


उसी समय हरिनाथ बाबा भी वहाँ पहुँच गए।

उन्होंने शांत स्वर में कहा—

"इसकी शक्ति डर और नफ़रत से बढ़ती है।

अगर तुम सब एक-दूसरे पर विश्वास करोगे...

तो इसका जादू टूट जाएगा।"

अमित ने संध्या का हाथ पकड़ लिया।

संध्या ने परी को गले लगा लिया।

दादी ने रोते हुए परिवार के लिए प्रार्थना की।

पहली बार कई दिनों बाद पूरा परिवार बिना किसी शिकायत के एक साथ खड़ा था।

कमरे की हवा अचानक बदल गई।

गुड़िया ज़ोर-ज़ोर से काँपने लगी।

उसकी मुस्कान गायब हो गई।


धीरे-धीरे गुड़िया की लकड़ी में दरारें पड़ने लगीं।

उसके भीतर से धुएँ जैसी काली परछाइयाँ निकलने लगीं।

वे चीख रही थीं।

जैसे वर्षों से कैद हों।

कुछ ही क्षणों में गुड़िया फर्श पर गिरकर टुकड़ों में बिखर गई।

पूरे घर में फैली घुटन अचानक समाप्त हो गई।

परी बेहोश होकर माँ की गोद में गिर पड़ी।

जब उसे होश आया, उसे पिछले कई दिनों की कोई बात याद नहीं थी।


कुछ महीनों बाद परिवार ने वह हवेली छोड़ दी।

नई ज़िंदगी शुरू हो गई।

सब कुछ सामान्य लगने लगा।

लेकिन एक दिन अमित को डाक से एक बिना प्रेषक वाला लकड़ी का डिब्बा मिला।

उसने खोला।

अंदर एक छोटी-सी लकड़ी की आँख रखी थी।

ठीक वैसी...

जैसी उस गुड़िया की थी।

साथ में एक पुराना कागज़ था, जिस पर सिर्फ़ एक पंक्ति लिखी थी—

"आत्माएँ खिलौने नहीं बनातीं... वे अपने अगले घर का रास्ता बनाती हैं।"

उस रात नए घर के बच्चों के कमरे से धीमी-सी हँसी सुनाई दी।

अमित दौड़कर भीतर गया।

कमरा खाली था।

लेकिन अलमारी के ऊपर...

एक नई लकड़ी की गुड़िया बैठी थी।

इस बार उसके कपड़े नीले थे।

उसने धीरे-धीरे अपना सिर घुमाया...

और बिना होंठ हिलाए फुसफुसाई—

"क्या तुम मेरे साथ खेलोगे?"

अगले ही पल पूरे घर की बत्तियाँ बुझ गईं।

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