वेताल वन का अंतिम तांत्रिक

 

वेताल वन का अंतिम तांत्रिक

जहाँ धरती के नीचे कैद है एक ऐसा दानव, जिसके जागते ही दुनिया का अंत निश्चित है...

सैकड़ों वर्ष पहले भारत के मध्य भाग में एक ऐसा घना जंगल था, जिसका नाम सुनते ही बड़े-बड़े योद्धाओं का साहस डगमगा जाता था। लोग उसे वेताल वन कहते थे। दिन के उजाले में भी वहाँ सूरज की किरणें ज़मीन तक नहीं पहुँचती थीं। पेड़ों की जड़ें साँपों की तरह हिलती दिखाई देती थीं, हवा में अनजानी फुसफुसाहटें गूँजती रहती थीं, और रात होते ही पूरा जंगल किसी जीवित प्राणी की तरह साँस लेने लगता था।

लेकिन वेताल वन का सबसे बड़ा रहस्य जंगल नहीं था।

उस जंगल की धरती के लगभग पाँच सौ फीट नीचे, सात तांत्रिकों द्वारा बनाए गए एक प्राचीन यंत्र-मंडल के भीतर कैद था कालवेताल—एक ऐसा दानव जिसे देवता भी नष्ट नहीं कर सके थे। उसकी शक्ति इतनी भयानक थी कि कहा जाता था, यदि वह कभी मुक्त हो गया, तो पहले आकाश अंधकार से भर जाएगा, फिर नदियाँ उल्टी दिशा में बहेंगी, और अंत में मनुष्य स्वयं अपने सबसे बड़े शत्रु बन जाएँगे।

सदियों पहले सात महान तांत्रिकों ने अपने प्राणों का बलिदान देकर कालवेताल को कैद किया था। लेकिन उस कैद को जीवित रखने के लिए हर पीढ़ी में एक तांत्रिक का जीवित रहना आवश्यक था। जैसे-जैसे समय बीतता गया, तांत्रिकों की परंपरा समाप्त होती चली गई। युद्ध, लालच, विश्वासघात और समय ने एक-एक कर सभी को निगल लिया।

अब पूरी दुनिया की रक्षा की ज़िम्मेदारी केवल एक व्यक्ति पर थी।

उसका नाम था अघोरनाथ

लोग उसे पागल साधु समझते थे। फटे हुए काले वस्त्र, जटाएँ, माथे पर भस्म, गले में रुद्राक्ष और आँखों में ऐसा तेज़ कि कोई देर तक उसकी ओर देख नहीं पाता था। वह वेताल वन के बीचों-बीच बने एक जर्जर मंदिर में अकेला रहता था। बाहर की दुनिया को यह पता भी नहीं था कि उनकी हर साँस एक ऐसे व्यक्ति की वजह से चल रही है, जिसका नाम इतिहास की किसी किताब में दर्ज नहीं था।

हर अमावस्या की रात अघोरनाथ जंगल के केंद्र में बने प्राचीन यंत्र के पास बैठकर सात घंटे तक एक गुप्त मंत्र का जाप करता। जैसे ही मंत्र समाप्त होता, धरती के भीतर से भयानक गर्जना सुनाई देती। पूरा जंगल काँप उठता। पेड़ों की शाखाएँ झुक जातीं। जानवर कई किलोमीटर दूर भाग जाते।

और हर बार एक ही आवाज़ गूँजती—

"कब तक रोक पाएगा मुझे, अंतिम तांत्रिक?"

अघोरनाथ केवल मुस्कुरा देता।

"जब तक मेरी साँस चलेगी।"

धरती फिर शांत हो जाती।

लेकिन इस बार कुछ अलग होने वाला था।

दिल्ली की पुरातत्व शोधकर्ता अनन्या वर्षों से वेताल वन पर शोध कर रही थी। उसे पुराने ताड़पत्रों में बार-बार एक ही प्रतीक दिखाई देता—सात वृत्तों से घिरा हुआ एक अग्नि-चक्र। उसी प्रतीक के पीछे-पीछे वह वेताल वन तक पहुँच गई।

गाँव वालों ने उसे रोकने की कोशिश की।

"बेटी, जंगल में रात मत बिताना।"

"क्यों?"

एक बूढ़े ने काँपते हुए कहा—

"क्योंकि वहाँ रात को इंसान नहीं... छायाएँ चलती हैं।"

लेकिन अनन्या विज्ञान पर विश्वास करती थी।

उसे लगा यह केवल लोककथा है।

वह कैमरा, ड्रोन और आधुनिक उपकरण लेकर जंगल में प्रवेश कर गई।

शाम तक सब कुछ सामान्य था।

फिर अचानक उसका ड्रोन आसमान में जलकर गिर पड़ा।

कंपास घूमने लगा।

मोबाइल बंद हो गया।

और हवा में राख की गंध फैल गई।

तभी उसने पहली बार अघोरनाथ को देखा।

वह विशाल बरगद के नीचे शांत बैठा था।

"तुम्हें यहाँ नहीं आना चाहिए था," उसने आँखें खोले बिना कहा।

अनन्या हँस पड़ी।

"मैं भूत-प्रेत में विश्वास नहीं करती।"

अघोरनाथ ने पहली बार उसकी ओर देखा।

"विश्वास न करने से सत्य बदल नहीं जाता।"

इतने में धरती ज़ोर से काँपी।

जंगल में बैठे हज़ारों कौवे एक साथ उड़ गए।

अघोरनाथ का चेहरा गंभीर हो गया।

"वह जाग रहा है।"

जंगल के बीचों-बीच पहुँचने पर अनन्या ने देखा कि ज़मीन पर विशाल यंत्र-मंडल बना हुआ था। उसके बीचों-बीच सात प्राचीन स्तंभ थे, जिन पर संस्कृत के रहस्यमयी मंत्र खुदे हुए थे।

लेकिन उन सात में से छह स्तंभ टूट चुके थे।

केवल एक स्तंभ खड़ा था।

अघोरनाथ ने कहा—

"हर टूटा हुआ स्तंभ एक तांत्रिक की मृत्यु का प्रतीक है।"

अचानक ज़मीन फटने लगी।

काली धुएँ जैसी ऊर्जा बाहर निकलने लगी।

उस धुएँ से धीरे-धीरे एक विशाल चेहरा बना।

लाल आँखें...

सैकड़ों दाँत...

और ऐसी हँसी कि पूरा जंगल काँप उठा।

कालवेताल।

"अंतिम तांत्रिक..."

उसकी आवाज़ बिजली की तरह गूँजी।

"तुम बूढ़े हो चुके हो।"

अघोरनाथ मुस्कुराया।

"हाँ... लेकिन अभी जीवित हूँ।"

दानव हँसा।

"आज तुम्हारी मृत्यु होगी।"

अचानक जंगल के हर पेड़ से काली परछाइयाँ उतरने लगीं।

वे दानव की सेना थी।

अनन्या ने अपनी आँखों से ऐसी चीज़ें देखीं जिनका कोई वैज्ञानिक उत्तर नहीं था।

अघोरनाथ ने अपनी कमंडलु से भस्म निकाली।

मंत्र पढ़ते ही वह भस्म अग्नि बन गई।

आसमान में सैकड़ों अग्नि-चक्र घूमने लगे।

परछाइयाँ एक-एक करके जलने लगीं।

लेकिन हर मरी हुई छाया की जगह दस नई छायाएँ पैदा हो जातीं।

युद्ध पूरी रात चलता रहा।

सुबह होने से पहले अघोरनाथ थक चुका था।

उसके शरीर पर गहरे घाव थे।

उधर कालवेताल की कैद लगभग टूट चुकी थी।

तभी अघोरनाथ ने अनन्या से कहा—

"सुनो..."

"अगर मैं मर गया..."

"तो दुनिया समाप्त हो जाएगी।"

"मैं क्या कर सकती हूँ?"

अघोरनाथ ने उसे एक पुराना ताड़पत्र दिया।

"यह आठवाँ मंत्र है।"

अनन्या चौंक गई।

"लेकिन सात तांत्रिक थे।"

अघोरनाथ मुस्कुराया।

"आठवाँ तांत्रिक हमेशा बाहर की दुनिया से आता है।"

अनन्या समझ नहीं पाई।

तभी धरती फट गई।

कालवेताल का आधा शरीर बाहर आ चुका था।

आकाश पूरी तरह काला हो गया।

नदियों का पानी लाल दिखाई देने लगा।

पेड़ों की जड़ें ज़मीन से बाहर निकल आईं।

दुनिया का संतुलन टूटने लगा।

अघोरनाथ ने अंतिम बार आँखें बंद कीं।

उसने अपनी सारी शक्ति यंत्र-मंडल में प्रवाहित कर दी।

लेकिन वह पर्याप्त नहीं थी।

अनन्या ने काँपते हुए ताड़पत्र खोला।

उस पर लिखा था—

"शक्ति जन्म से नहीं... त्याग से मिलती है।"

उसने मंत्र पढ़ना शुरू किया।

जैसे-जैसे मंत्र आगे बढ़ा, उसके शरीर के चारों ओर सुनहरी रोशनी फैलने लगी।

सात टूटे हुए स्तंभ धीरे-धीरे फिर से जुड़ने लगे।

अघोरनाथ ने संतोष से मुस्कुराकर कहा—

"परंपरा समाप्त नहीं हुई..."

"बस छिप गई थी।"

कालवेताल पूरी शक्ति से बाहर निकलने की कोशिश करने लगा।

लेकिन आठों स्तंभों से निकली दिव्य ऊर्जा ने उसे फिर से नीचे धकेल दिया।

इस बार कैद पहले से भी अधिक शक्तिशाली थी।

दानव की अंतिम चीख पूरे जंगल में गूँज उठी—

"मैं फिर लौटूँगा..."

और धरती बंद हो गई।

सुबह की पहली किरण वेताल वन पर पड़ी।

सैकड़ों वर्षों बाद पहली बार जंगल में पक्षियों का मधुर स्वर सुनाई दिया।

अघोरनाथ ज़मीन पर निढाल पड़ा था।

उसकी साँसें थम चुकी थीं।

उसके चेहरे पर अद्भुत शांति थी।

अनन्या ने उनकी चिता उसी बरगद के नीचे बनाई, जहाँ वे वर्षों तक साधना करते रहे थे।

दुनिया को कभी यह पता नहीं चला कि एक साधारण दिखने वाले बूढ़े तांत्रिक ने अनगिनत बार मानवता को विनाश से बचाया था।

कुछ महीनों बाद अनन्या ने अपना शोध अधूरा छोड़ दिया।

वह शहर नहीं लौटी।

लोगों ने उसे आखिरी बार वेताल वन की ओर जाते देखा।

अब हर अमावस्या की रात जंगल के भीतर दूर कहीं एक दीपक जलता दिखाई देता है।

कहा जाता है कि वेताल वन का अंतिम तांत्रिक मर चुका है... लेकिन उसकी परंपरा जीवित है।

आज भी यदि कोई लालच, शक्ति या जिज्ञासा में उस जंगल के सबसे भीतर तक पहुँच जाए, तो उसे कभी-कभी एक युवा साधिका दिखाई देती है, जिसके हाथ में रुद्राक्ष की माला होती है और जिसकी आँखों में वही तेज़ चमकता है जो कभी अघोरनाथ की आँखों में था।

गाँव के बुज़ुर्ग आज भी अपने बच्चों से कहते हैं—

"दुनिया इसलिए सुरक्षित है क्योंकि कुछ युद्ध कभी इतिहास में लिखे ही नहीं जाते। वे चुपचाप अंधेरे में लड़े जाते हैं... और उनके रक्षक अपना नाम तक पीछे नहीं छोड़ते।"

और अमावस्या की सबसे शांत रातों में, जब वेताल वन की गहराइयों से धरती हल्की-सी काँपती है, नई तांत्रिक अपनी आँखें बंद करके वही प्राचीन मंत्र दोहराती है।

क्योंकि वह जानती है—

कालवेताल मरा नहीं है। वह केवल सो रहा है। और जब तक वेताल वन साँस लेता रहेगा, किसी न किसी तांत्रिक को पूरी दुनिया के लिए जागते रहना होगा।

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