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आत्माओं को बुलाने वाला आईना

 

आत्माओं को बुलाने वाला आईना
आत्माओं को बुलाने वाला आईना

(The Mirror That Summons Souls)

राजस्थान के अरावली पर्वतों के बीच एक उजड़ा हुआ महल था, जिसे लोग "चंद्रमहल हवेली" के नाम से जानते थे। कभी यह राजघराने की शान हुआ करता था, लेकिन आज वहाँ केवल टूटती दीवारें, जाले, धूल और सन्नाटा बचा था। गाँव के बुज़ुर्ग कहते थे कि उस हवेली में रखा एक प्राचीन आईना किसी साधारण काँच का टुकड़ा नहीं था। वह जीवित और मृत संसार के बीच एक ऐसा द्वार था, जो हर अमावस्या की रात खुलता था।

लोगों का विश्वास था कि जो भी उस आईने में आधी रात के बाद अपना चेहरा देखता, उसे अपना प्रतिबिंब नहीं, बल्कि उन आत्माओं के चेहरे दिखाई देते जो जीवन और मृत्यु के बीच फँसी हुई थीं। यदि उनमें से किसी आत्मा ने आपका नाम ले लिया, तो आपकी परछाईं उसी आईने में कैद हो जाती और आपकी आत्मा हमेशा के लिए उस हवेली का हिस्सा बन जाती।

इसी रहस्य ने युवा इतिहासकार आर्यन को अपनी ओर खींच लिया। उसे प्राचीन वस्तुओं और भुला दिए गए इतिहास की खोज का शौक था। जब उसने उस रहस्यमयी आईने की कहानी सुनी, तो उसने तय कर लिया कि वह सच्चाई दुनिया के सामने लाकर रहेगा।

गाँव पहुँचते ही उसे हर व्यक्ति ने एक ही सलाह दी—"महल में जाना हो तो दिन में जाना। लेकिन अगर किसी कारण रात हो जाए, तो उस बड़े आईने के सामने कभी मत रुकना। चाहे उसमें तुम्हें कोई अपना ही क्यों न दिखाई दे।"

आर्यन इन बातों पर मुस्कुरा दिया। उसे लगा कि यह भी किसी लोककथा का हिस्सा है। कैमरा, टॉर्च और नोटबुक लेकर वह हवेली की ओर निकल पड़ा।

सूरज ढलने तक वह हवेली पहुँच गया। विशाल दरवाज़े आधे टूट चुके थे। संगमरमर की सीढ़ियों पर धूल की मोटी परत जमी थी। भीतर कदम रखते ही ऐसा लगा जैसे वर्षों से बंद हवा अचानक जाग उठी हो। हर कमरे में पुराने चित्र, टूटे हुए झूमर और बिखरा हुआ फर्नीचर पड़ा था।

हवेली के सबसे बड़े कक्ष में पहुँचते ही उसकी नज़र उस प्रसिद्ध आईने पर पड़ी।

करीब दस फ़ुट ऊँचा वह आईना काले सागौन की लकड़ी के नक्काशीदार फ्रेम में जड़ा था। आश्चर्य की बात यह थी कि पूरी हवेली धूल से ढकी थी, लेकिन आईने का काँच बिल्कुल साफ़ था, मानो किसी ने अभी-अभी उसे चमकाया हो।

आर्यन ने कैमरा चालू किया और आईने की ओर बढ़ गया।

जैसे ही उसने अपनी टॉर्च की रोशनी आईने पर डाली, कमरे का तापमान अचानक गिर गया। उसकी साँसों से धुआँ निकलने लगा। उसने आईने में देखा।

लेकिन वहाँ उसका प्रतिबिंब नहीं था।

वहाँ एक युवती खड़ी थी।

सफेद साड़ी, खुले बाल और आँखों में गहरी उदासी। उसने धीमे स्वर में कहा, "तुम मुझे देख सकते हो... इतने वर्षों बाद कोई मुझे देख सकता है।"

आर्यन घबरा गया। उसने पीछे मुड़कर देखा। कमरा खाली था।

फिर उसने दोबारा आईने में देखा।

अब वहाँ केवल वह युवती नहीं थी। उसके पीछे दर्जनों चेहरे दिखाई दे रहे थे। बूढ़े, बच्चे, सैनिक, नौकर, महिलाएँ—सबके चेहरे पीले और निष्प्राण थे। वे सभी कुछ कहना चाहते थे, लेकिन उनकी आवाज़ काँच के भीतर दबकर रह जाती थी।

अचानक सभी आत्माओं ने एक साथ अपने हाथ आईने पर रख दिए।

काँच की दूसरी ओर से भी हथेलियों के निशान उभर आए।

कमरे में किसी बच्चे के रोने की आवाज़ गूँज उठी।

आर्यन भागना चाहता था, लेकिन उसके पैर जैसे ज़मीन में धँस गए थे।

तभी वही युवती फिर दिखाई दी।

उसने अपना नाम मृणालिनी बताया। वह इस हवेली के अंतिम जागीरदार की बेटी थी। लगभग डेढ़ सौ वर्ष पहले उसके पिता तांत्रिक विद्याओं के पीछे पागल हो चुके थे। अमर होने की लालसा में उन्होंने एक निषिद्ध अनुष्ठान किया। उस अनुष्ठान में इस विशेष आईने को जीवित और मृत संसार के बीच द्वार बनाया गया।

लेकिन साधना असफल हो गई।

द्वार तो खुल गया, पर बंद नहीं हो सका।

उस रात पूरे महल में मौजूद हर व्यक्ति की आत्मा उसी आईने में कैद हो गई।

तब से जो भी इस आईने के सामने आधी रात के बाद आता, उसकी जीवन-ऊर्जा उन कैद आत्माओं को जीवित रखने में लग जाती।

आर्यन ने पूछा, "अगर मैं इस आईने को तोड़ दूँ तो?"

मृणालिनी के चेहरे पर भय छा गया।

"काँच टूटेगा तो आत्माएँ मुक्त नहीं होंगी... वे पूरी दुनिया में फैल जाएँगी।"

इतने में आईने की सतह पानी की तरह लहराने लगी।

धीरे-धीरे एक काला हाथ बाहर निकला।

फिर दूसरा।

कुछ ही क्षणों में दर्जनों काले हाथ काँच से बाहर निकलकर आर्यन की ओर बढ़ने लगे। उनकी उँगलियाँ बर्फ जैसी ठंडी थीं। उन्होंने आर्यन के पैरों को पकड़ लिया और उसे आईने की ओर घसीटने लगे।

आर्यन पूरी ताकत से संघर्ष कर रहा था।

तभी मृणालिनी चिल्लाई, "उनकी ओर मत देखो! उनकी आँखों में देखोगे तो वे तुम्हारी यादें चुरा लेंगे।"

लेकिन देर हो चुकी थी।

एक पल के लिए आर्यन की नज़र उन आत्माओं से मिली।

अचानक उसके सामने बचपन की यादें घूमने लगीं। माँ की आवाज़, पिता की मुस्कान, स्कूल का पहला दिन—सब धुँधला पड़ने लगा। उसे अपना नाम तक याद नहीं रहा।

आत्माएँ मुस्कुराने लगीं।

उन्हें नया कैदी मिल चुका था।

तभी आर्यन की जेब से उसकी माँ द्वारा दिया गया छोटा-सा चाँदी का लॉकेट नीचे गिरा। लॉकेट खुलते ही उसमें रखी भगवान शिव की छोटी-सी प्रतिमा दिखाई दी।

पूरा कमरा तेज़ प्रकाश से भर गया।

आईने के भीतर कैद आत्माएँ चीखने लगीं।

मृणालिनी ने अवसर देखकर आर्यन से कहा, "द्वार बंद करना होगा। वरना यह श्राप कभी खत्म नहीं होगा।"

आईने के पीछे एक गुप्त कक्ष था, जहाँ वही अधूरा तांत्रिक अनुष्ठान अंकित था। वहाँ एक प्राचीन शिलालेख पर लिखा था—

"जो अपनी सबसे प्रिय स्मृति का त्याग करेगा, वही इस द्वार को हमेशा के लिए बंद कर सकेगा।"

आर्यन समझ गया कि इसकी कीमत बहुत बड़ी होगी।

उसने अपनी सबसे प्रिय स्मृति चुनी—अपने माता-पिता के साथ बिताया अंतिम दिन।

जैसे ही उसने मंत्र पूरा किया, वह स्मृति हमेशा के लिए उसके मन से मिट गई।

आईना काँपने लगा।

एक-एक करके सभी आत्माएँ प्रकाश में बदलने लगीं।

मृणालिनी ने मुस्कुराकर कहा, "आज पहली बार किसी ने हमें मुक्त किया है।"

कुछ ही क्षणों में पूरा आईना काले धुएँ में बदल गया और फिर राख बनकर बिखर गया।

महल में वर्षों बाद सन्नाटा नहीं, बल्कि शांति थी।

आर्यन बाहर निकल आया।

लेकिन उसे महसूस हुआ कि उसके भीतर कुछ हमेशा के लिए बदल चुका है।

उसे याद ही नहीं था कि वह अपने माता-पिता से आख़िरी बार कब मिला था। उसकी डायरी में उस दिन की तस्वीरें थीं, लेकिन वे उसके लिए किसी अजनबी की कहानी जैसी थीं।

कई महीनों बाद उसकी लिखी पुस्तक प्रकाशित हुई। लोग उसे एक कल्पनात्मक उपन्यास समझकर पढ़ने लगे।

एक रात पुस्तक के विमोचन के बाद वह अपने होटल के कमरे में लौटा।

बाथरूम के आईने में उसने हाथ-मुँह धोया और जैसे ही सिर उठाया...

उसे अपना चेहरा दिखाई नहीं दिया।

आईने में मृणालिनी खड़ी थी।

वह मुस्कुराई।

फिर धीरे से बोली—

"द्वार बंद हो गया है... लेकिन हर आईना एक रास्ता बन सकता है। और कुछ आत्माएँ... कभी पूरी तरह मुक्त नहीं होतीं।"

अगले ही पल आईना सामान्य हो गया।

आज भी कहा जाता है कि यदि किसी पुराने, अनजान आईने में आपको अपना प्रतिबिंब एक पल के लिए गायब दिखाई दे...

तो तुरंत वहाँ से हट जाइए।

क्योंकि हो सकता है कि दूसरी ओर कोई आत्मा वर्षों से बस आपका नाम सुनने का इंतज़ार कर रही हो।

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