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ट्रेन में मिली लड़की और गायब स्टेशन
विवेक उस रात ट्रेन में सिर्फ एक सफर करने बैठा था, मगर उसे नहीं पता था कि यह सफर उसकी जिंदगी की सबसे अजीब प्रेम कहानी बन जाएगा। बाहर दिसंबर की ठंडी बारिश खिड़कियों पर थपकियां दे रही थी और रात की ट्रेन अंधेरे खेतों को चीरती हुई आगे बढ़ रही थी। विवेक की सीट S-5 कोच में थी, खिड़की के पास। जैसे ही ट्रेन ने शहर की आखिरी रोशनी पीछे छोड़ी, सामने वाली सीट पर एक लड़की आकर बैठी। सफेद शॉल, भीगे बाल, हाथ में पुराना चमड़े का बैग और आंखों में ऐसी उदासी, जैसे वह किसी का इंतजार बीस साल से कर रही हो। उसने मुस्कुराकर पूछा, “क्या आप रूपगढ़ स्टेशन पर उतरेंगे?” विवेक ने कहा, “नहीं, वह स्टेशन तो इस route पर है ही नहीं।” लड़की ने खिड़की के बाहर देखा और धीमे से बोली, “है… बस लोग उसे याद रखना छोड़ चुके हैं।”
विवेक ने उसे ध्यान से देखा। वह इस समय की लड़की लगती भी थी और नहीं भी। उसके पास smartphone नहीं था। वह टिकट की जगह पुराना गुलाबी कागज पकड़े थी, जिस पर नीली स्याही से लिखा था—रूपगढ़ हाल्ट। टिकट पर तारीख धुंधली थी, लेकिन ऊपर छपा साल साफ पढ़ा जा सकता था—2004।
विवेक ने सोचा शायद किसी heritage event का ticket होगा, या लड़की को पुराने सामान जमा करने का शौक होगा। वह हंसा, “आप मजाक अच्छा करती हैं।”
लड़की ने उसकी ओर देखा। “मैं मजाक नहीं करती। बहुत समय पहले करना छोड़ दिया।”
“आपका नाम?”
“सहर।”
नाम सुनते ही विवेक को लगा जैसे कोच की हवा और ठंडी हो गई हो। उसने अपना परिचय दिया। “मैं विवेक हूं। नवरंगपुर जा रहा हूं। वहां job interview है।”
सहर ने हल्की मुस्कान दी। “आप नई जिंदगी शुरू करने जा रहे हैं।”
“शायद।”
“नई जिंदगी शुरू करने से पहले पुरानी कहानियां सुन लेनी चाहिए। नहीं तो वही कहानियां रास्ता रोक लेती हैं।”
विवेक उसकी बात पर कुछ बोल नहीं पाया। ट्रेन की रोशनी हल्की-हल्की झपक रही थी। आसपास के यात्री सो चुके थे। सिर्फ पहियों की आवाज थी—टक-टक, टक-टक, जैसे कोई पुराना दिल अब भी धड़क रहा हो।
धीरे-धीरे बातचीत शुरू हुई। सहर ने बताया कि उसे बारिश पसंद है, क्योंकि बारिश आवाजों को छिपा देती है। उसने कहा कि उसे ट्रेनें पसंद हैं, क्योंकि ट्रेनें लोगों को लेकर आगे बढ़ती हैं, लेकिन कुछ लोग हमेशा उसी स्टेशन पर अटके रह जाते हैं जहां उनका इंतजार अधूरा रह गया हो।
“आप बहुत अजीब बातें करती हैं,” विवेक ने कहा।
“और आप बहुत जल्दी भरोसा कर लेते हैं,” सहर ने जवाब दिया।
“आप पर भरोसा न करूं?”
सहर ने खिड़की के बाहर देखा। “करिए। शायद इसी भरोसे से कुछ बदल जाए।”
विवेक को समझ नहीं आ रहा था कि वह लड़की उसे खींच क्यों रही है। वह सुंदर थी, लेकिन उसकी सुंदरता से ज्यादा उसकी उदासी मन को छू रही थी। उसकी आंखों में डर नहीं था, फिर भी कोई पुराना दर्द गहराई में बैठा था। वह बोलती कम थी, पर हर वाक्य जैसे किसी छिपी हुई किताब से निकला हो।
रात करीब दो बजे ट्रेन अचानक धीमी होने लगी। विवेक ने बाहर देखा। अंधेरे में कोई छोटा-सा प्लेटफॉर्म दिखा। स्टेशन की टूटी छत, जंग लगा बोर्ड, पीली रोशनी का अकेला बल्ब और दूर एक पुरानी घड़ी जो 2:17 पर रुकी हुई थी।
बोर्ड पर लिखा था—रूपगढ़ हाल्ट।
विवेक का दिल तेज धड़कने लगा। “यह स्टेशन सच में है?”
सहर उठ खड़ी हुई। “था।”
“क्या मतलब?”
उसने अपना बैग उठाया। “मुझे उतरना होगा।”
“लेकिन इतनी रात में? यहां कोई नहीं है।”
“मैं हमेशा यहीं उतरती हूं।”
विवेक ने उसका हाथ पकड़ लिया। हाथ बर्फ जैसा ठंडा था। “रुको। तुम कौन हो?”
सहर की आंखें भर आईं। “अगर सुबह तुम्हें मैं याद रहूं, तो पुराने स्टेशन मास्टर के कमरे में जाना। दीवार के पीछे लाल रजिस्टर देखना।”
“क्यों?”
“क्योंकि मेरी कहानी accident नहीं थी।”
इतना कहकर वह उतर गई।
विवेक भी उसके पीछे उतरना चाहता था, लेकिन तभी train तेज झटके से चल पड़ी। दरवाजा बंद हो गया। वह window से चिल्लाया, “सहर!”
सहर प्लेटफॉर्म पर खड़ी थी। पीले बल्ब की रोशनी में उसका चेहरा धुंधला हो रहा था। उसने हाथ उठाया। अगले ही पल प्लेटफॉर्म अंधेरे में डूब गया।
सुबह विवेक की आंख खुली तो ट्रेन नवरंगपुर पहुंच रही थी। उसे पहले लगा सब सपना था। लेकिन उसकी मुट्ठी में कुछ दबा था। उसने हाथ खोला। वह वही गुलाबी पुराना टिकट था—रूपगढ़ हाल्ट, 2004।
वह तुरंत TTE के पास गया। “कल रात ट्रेन रूपगढ़ हाल्ट पर रुकी थी?”
TTE ने चौंककर कहा, “कौन सा station?”
“रूपगढ़ हाल्ट।”
TTE ने हंसते हुए कहा, “भाई साहब, वह station तो बीस साल पहले बंद हो गया। इस route पर अब ट्रेन वहां रुकती ही नहीं।”
विवेक के चेहरे का रंग उड़ गया।
“लेकिन मैं उतरा नहीं, पर मैंने देखा। प्लेटफॉर्म, बोर्ड, एक लड़की…”
TTE गंभीर हो गया। “रात को सफर में ऐसी बातें मत सोचिए। पुराने लोग कहते हैं उस तरफ track पर धुंध में पुराना station दिखता है। पर official route में वह नहीं है।”
“वह क्यों बंद हुआ?”
TTE ने धीमे स्वर में कहा, “2004 में वहां बड़ा हादसा हुआ था। Station master मारा गया। उसकी बेटी गायब हुई। उसी के बाद station बंद।”
विवेक ने टिकट कसकर पकड़ लिया। वह नवरंगपुर interview के लिए आया था, मगर अब उसके मन में सिर्फ सहर थी। क्या वह station master की बेटी थी? क्या वह मर चुकी थी? या किसी ने उसकी कहानी दबा दी थी?
उसने interview छोड़ दिया और taxi लेकर पुराने route की तरफ निकल गया। Driver पहले तो तैयार नहीं हुआ। उसने कहा, “साहब, रूपगढ़ की तरफ कोई नहीं जाता। वहां station खंडहर है।”
“मुझे जाना है।”
करीब दो घंटे बाद वे एक पुराने कच्चे रास्ते पर पहुंचे। झाड़ियों के पीछे टूटा हुआ प्लेटफॉर्म दिखाई दिया। बोर्ड सच में था—जंग लगा, आधा टूटा, पर नाम अब भी पढ़ा जा सकता था: रूपगढ़ हाल्ट।
विवेक उतरकर प्लेटफॉर्म पर गया। रात वाले पीले बल्ब की जगह सिर्फ टूटी holder लटक रही थी। स्टेशन की घड़ी 2:17 पर रुकी थी। हवा में सूखे पत्तों और पुराने लोहे की गंध थी।
Station master का कमरा प्लेटफॉर्म के अंत में था। दरवाजा आधा टूटा था। अंदर धूल, पुराने कागज, लकड़ी की मेज और दीवार पर लगी फटी हुई कैलेंडर शीट थी—साल 2004।
विवेक ने दीवार टटोली। एक जगह ईंट ढीली थी। उसने ईंट हटाई। पीछे कपड़े में लिपटा लाल रजिस्टर मिला।
रजिस्टर खोलते ही पहला पन्ना उसके हाथों में कांपने लगा।
यह station master हरिनारायण दत्त की diary थी। उसमें रोज की train timings, मालगाड़ी entries, weather notes और कुछ निजी बातें लिखी थीं। आखिरी pages में लिखावट बेचैन हो गई थी।
“16 दिसंबर 2004—आज रात फिर illegal parcel उतरे। मालगाड़ी बिना entry के रुकी। स्टेशन को transit point बनाया जा रहा है। मैंने report भेजी, पर ऊपर से कोई जवाब नहीं।”
“18 दिसंबर 2004—सहर ने platform पर दो अजनबी आदमियों को देखा। वे कह रहे थे, अगली रात ‘नंबर 27’ वाला डिब्बा खाली होना चाहिए।”
“19 दिसंबर 2004—मुझे धमकी मिली। कहा गया, signal बदल दो, नहीं तो बेटी को उठा लेंगे।”
“20 दिसंबर 2004—अगर मेरे साथ कुछ होता है, तो यह accident नहीं होगा। सच पुराने signal cabin की लोहे की पेटी में है।”
विवेक ने सांस रोक ली।
तो हादसा सिर्फ हादसा नहीं था।
यह पहला बड़ा crime clue था।
रूपगढ़ स्टेशन किसी illegal smuggling route का हिस्सा था। Station master ने सच पकड़ लिया था। सहर ने भी कुछ देखा था। और फिर वह गायब हो गई।
विवेक signal cabin की ओर दौड़ा। Cabin अब झाड़ियों से ढका था। अंदर लोहे की पुरानी पेटी पड़ी थी। ताला जंग लगा था। उसने पत्थर से तोड़ दिया। पेटी में पुरानी black-and-white photos, कुछ train cargo slips, एक टूटा कैमरा roll और एक चांदी का ब्रोच था। ब्रोच पर छोटे अक्षरों में लिखा था—M.R.
Photos में रात के अंधेरे में कुछ आदमी train से crates उतारते दिख रहे थे। एक आदमी का चेहरा साफ नहीं था, पर उसकी coat pocket पर वही ब्रोच लगा था।
Cargo slips पर fake names थे, लेकिन नीचे एक signature बार-बार दिख रहा था—माधव रंधावा।
विवेक ने mobile से search किया। माधव रंधावा अब नवरंगपुर का बड़ा industrialist था। Rail contracts, warehouses, private logistics—सब उसके control में था। बीस साल पहले वह railway supply contractor था।
विवेक को समझ आ गया कि यह मामला बहुत बड़ा था।
उसने local police station में जाकर diary और photos दिखाने की कोशिश की। SHO ने पहले हंसी में टाल दिया। “बीस साल पुराने ghost station की कहानी लेकर आए हो?”
लेकिन जब विवेक ने cargo slips दिखाए, SHO का चेहरा गंभीर हुआ। उसने files निकलवाईं। Official report में लिखा था कि 20 दिसंबर 2004 की रात signal failure हुआ, station master हरिनारायण दत्त track पर गिरकर मारा गया, और उसकी बेटी सहर शायद shock में घर छोड़कर भाग गई। Body नहीं मिली। Case बंद।
विवेक ने पूछा, “उस रात train वहां क्यों रुकी थी?”
SHO ने कहा, “Report में लिखा है train नहीं रुकी।”
“लेकिन diary कहती है रुकी थी।”
“Diary evidence नहीं, private note है।”
विवेक समझ गया कि पुलिस बिना दबाव कुछ नहीं करेगी। उसने शहर की senior journalist कनिष्का राव से संपर्क किया। कनिष्का ने पहले उसे पागल समझा, लेकिन जब उसने photos, register और ticket दिखाया, तो वह चुप हो गई।
“यह ticket असली है,” उसने कहा। “यह old railway stock है। और यह माधव रंधावा… यह आदमी अब बहुत powerful है।”
“तो आप story करेंगी?”
“अगर हम गलत हुए, तो defamation case होगा। अगर सही हुए, तो जान का खतरा होगा।”
विवेक ने धीरे से कहा, “एक लड़की बीस साल से इंतजार कर रही है।”
कनिष्का ने उसे देखा। “तुम उसे जानते भी नहीं।”
विवेक की आंखों में रात का प्लेटफॉर्म उतर आया। “शायद नहीं। पर उसने मुझ पर भरोसा किया।”
कनिष्का ने जांच शुरू की। पुराने railway records, retired employees, local villagers—सबसे बात हुई। धीरे-धीरे सच खुलने लगा। बीस साल पहले रूपगढ़ हाल्ट पर रात में illegal arms और antique idols की तस्करी होती थी। मालगाड़ियों के कुछ डिब्बे बिना entry के रोके जाते थे। Station master हरिनारायण ने report की। सहर ने एक रात smugglers को पहचान लिया। उनमें माधव रंधावा और railway protection force का एक अधिकारी शामिल थे।
हादसे वाली रात signal system जानबूझकर बदला गया। हरिनारायण को track पर धक्का दिया गया। सहर ने यह देख लिया। वह भागी। उसे पकड़ने की कोशिश हुई। उसके बाद वह कभी नहीं मिली।
लेकिन कहानी में एक बात अजीब थी—उस रात कई लोगों ने कहा कि एक passenger train अचानक 2:17 पर रूपगढ़ के पास रुक गई थी, जबकि official records में उसका कोई stop नहीं था।
विवेक को याद आया—रात, वही समय, वही station।
क्या हर साल? हर रात? या सिर्फ उन लोगों के लिए जो सच ढूंढ सकते हैं?
तीसरी रात वह फिर उसी train में चढ़ा। इस बार उसके पास recording devices थे। कनिष्का और एक trusted cameraman दूसरे coach में थे। रात 2:17 पर train फिर धीमी हुई। Official route में stop नहीं था, फिर भी train रुक गई। खिड़की के बाहर वही पीली रोशनी जल उठी।
रूपगढ़ हाल्ट।
विवेक का दिल धड़कने लगा।
सहर प्लेटफॉर्म पर खड़ी थी।
इस बार वह डरती नहीं दिख रही थी। उसके हाथ में वही लाल रजिस्टर था, लेकिन उसकी आंखों में उम्मीद थी।
विवेक उतर गया। ट्रेन अजीब तरह से स्थिर थी। कोई और यात्री जागा नहीं। समय जैसे रुक गया था।
“तुमने रजिस्टर पढ़ लिया,” सहर ने कहा।
“तुम सहर हो?”
उसने सिर हिलाया।
“तुम्हारे साथ क्या हुआ था?”
सहर ने प्लेटफॉर्म की ओर देखा। “मैं भागी थी। मैंने पिता को मरते देखा। मैंने माधव रंधावा को देखा। मैं signal cabin में छिपी। मेरे पास camera roll था। उन्होंने मुझे ढूंढ लिया।”
विवेक की आंखें भर आईं। “उन्होंने तुम्हें मार दिया?”
“मेरी देह नदी में फेंक दी। पर कहानी यहीं रह गई।”
“तुम हर रात यहां आती हो?”
“नहीं,” उसने कहा। “मैं हर रात नहीं आती। मैं तब आती हूं जब कोई यात्री खाली दिल लेकर गुजरता है और सच सुनने की हिम्मत रखता है।”
विवेक चुप रहा।
सहर ने उसकी ओर देखा। “तुम्हारे अंदर भी एक बंद station है, विवेक। तुम job interview के लिए नहीं जा रहे थे। तुम अपने पिता की मौत से भाग रहे थे।”
विवेक सन्न रह गया। उसने यह बात किसी से नहीं कही थी। उसके पिता भी railway में clerk थे और एक corruption case में गवाही देने से पहले “accident” में मर गए थे। विवेक घर छोड़कर नई नौकरी में खुद को भूल जाना चाहता था।
“तुम्हें कैसे पता?”
सहर ने हल्की मुस्कान दी। “जो लोग अधूरे सच के साथ सफर करते हैं, उनकी धड़कन अलग होती है।”
विवेक की आंखें भर आईं। शायद इसी कारण वह सहर से इतना जुड़ गया था। वह सिर्फ रहस्यमयी लड़की नहीं थी। वह उन सभी अधूरे सचों की आवाज थी जिन्हें डर ने दबा दिया था।
“मैं तुम्हें न्याय दिलाऊंगा,” विवेक ने कहा।
सहर ने धीरे से अपना ब्रोच निकाला। वही चांदी का ब्रोच—M.R. वाला नहीं, बल्कि एक छोटा नीला फूल। “यह मेरी मां का था। मेरी देह जहां है, वहां यह दूसरा हिस्सा मिलेगा। नदी के पुराने मोड़ पर, पीपल के नीचे।”
“तुम्हारी body वहीं है?”
“हाँ। और camera roll भी वहीं छुपा है। मैंने मरने से पहले मिट्टी में दबा दिया था।”
“मैं ढूंढ लूंगा।”
सहर की आंखों में पहली बार रोशनी आई। “जल्दी करना। वे लोग अब भी जिंदा हैं। और माधव रंधावा जान चुका है कि कोई पुराने station तक पहुंच गया है।”
अचानक प्लेटफॉर्म कांपने लगा। दूर से सीटी की तेज आवाज आई। सहर पीछे हटने लगी।
विवेक ने उसका हाथ पकड़ना चाहा। इस बार उसका हाथ पहले से भी हल्का था, जैसे धुंध।
“क्या तुम फिर मिलोगी?” उसने पूछा।
सहर ने कहा, “अगर सच पूरा न हुआ, तो हां। अगर सच पूरा हो गया… तो शायद नहीं।”
“मैं नहीं चाहता कि तुम गायब हो जाओ।”
सहर की मुस्कान उदास थी। “कभी-कभी प्रेम का मतलब किसी को रोकना नहीं, मुक्त करना होता है।”
ट्रेन चल पड़ी। विवेक चढ़ गया। सुबह जब वह जागा, उसके हाथ में नीले फूल वाला ब्रोच था।
कनिष्का ने उस रात की footage देखी। Train GPS data में 2:17 से 2:23 तक blank था। Camera में प्लेटफॉर्म धुंधला दिखा, लेकिन सहर साफ नहीं थी। फिर भी station का board, रुकी clock, और विवेक का प्लेटफॉर्म पर उतरना रिकॉर्ड हो गया था।
वे नदी के पुराने मोड़ पर गए। पीपल के नीचे खुदाई हुई। पुलिस इस बार साथ थी, क्योंकि कनिष्का ने story publish करने की धमकी दे दी थी। मिट्टी से मानव अस्थियां मिलीं। साथ में कैमरा roll का जंग लगा container और नीले ब्रोच का टूटा दूसरा हिस्सा मिला।
Forensic जांच ने साबित किया कि अस्थियां एक लगभग बीस साल पुरानी युवा लड़की की थीं। Station master हरिनारायण की पुरानी family items से DNA match हुआ—वह सहर थी।
Camera roll को मुश्किल से restore किया गया। उसमें हादसे वाली रात की तस्वीरें थीं। माधव रंधावा crates उतरवा रहा था। RPF अधिकारी हथियार पकड़े था। हरिनारायण को धक्का देते आदमी दिख रहे थे। आखिरी photo धुंधली थी—शायद सहर भागते हुए खींच रही थी। उसमें माधव रंधावा का चेहरा साफ था।
मामला national news बन गया। “बीस साल पुराने बंद स्टेशन से खुला तस्करी और हत्या का राज।” कनिष्का की report ने तहलका मचा दिया। पुराने officials पर केस खुला। माधव रंधावा गिरफ्तार हुआ। पहले उसने सब नकारा, फिर recovered photos, cargo records और retired कर्मचारी की गवाही के सामने टूट गया।
उसने कहा, “हमने स्टेशन मास्टर को डराया था। मारने का इरादा नहीं था।”
विवेक ने अदालत में कहा, “जो सच बोलने वाले को track पर धक्का देता है, उसका इरादा कानून तय करेगा। लेकिन जिसने बेटी की देह छुपाई, उसका अपराध समय भी नहीं धो सकता।”
रूपगढ़ हाल्ट का नाम फिर से records में आया। Station officially बंद था, लेकिन अब उसे memorial बनाने का प्रस्ताव पास हुआ। प्लेटफॉर्म साफ किया गया। रुकी हुई घड़ी ठीक नहीं की गई। उसे 2:17 पर ही रहने दिया गया—याद के रूप में।
केस खत्म होने के बाद विवेक आखिरी बार उसी रात की ट्रेन में चढ़ा। वह जानता था कि शायद यह उसका अंतिम सफर होगा। S-5 कोच में खिड़की के पास बैठकर वह बाहर देखता रहा। रात गहरी हुई। बारिश शुरू हुई। 2:17 पर ट्रेन धीमी हुई।
रूपगढ़ हाल्ट फिर दिखा।
इस बार प्लेटफॉर्म उजला था। पीला बल्ब स्थिर जल रहा था। सहर वहीं खड़ी थी, पर उसकी आंखों से बीस साल का इंतजार उतर चुका था। उसने सफेद शॉल नहीं, हल्का नीला दुपट्टा पहन रखा था। उसके पीछे एक वृद्ध आदमी खड़ा था—station master हरिनारायण। शायद उसका पिता।
विवेक उतर गया।
“सच पूरा हो गया,” सहर ने कहा।
“तो अब तुम चली जाओगी?”
“हाँ।”
विवेक ने आंखें झुका लीं। “मैं तुमसे प्यार करने लगा था।”
सहर ने उसकी ओर देखा। “मुझे पता है।”
“क्या यह पागलपन है?”
“नहीं,” सहर ने कहा। “कभी-कभी दो अधूरे लोग मिलते हैं। उनमें से एक जीवित होता है, दूसरा स्मृति। फिर भी प्रेम हो जाता है, क्योंकि प्रेम शरीर से पहले आत्मा को पहचानता है।”
विवेक की आंखें भर आईं। “मैं तुम्हें रोक नहीं सकता?”
“अगर रोक लोगे, तो मैं फिर से इसी स्टेशन पर अटक जाऊंगी।”
विवेक चुप हो गया।
सहर ने उसका हाथ छुआ। इस बार उसका हाथ ठंडा नहीं था। हल्का था, जैसे सुबह की धूप।
“तुमने मुझे न्याय दिया,” उसने कहा। “अब अपने पिता के सच से मत भागना। हर अधूरी कहानी तुम्हें नहीं बुलाएगी। कुछ तुम्हें खुद खोलनी होंगी।”
विवेक ने सिर हिलाया। “मैं कोशिश करूंगा।”
“और प्रेम?”
“वह?”
सहर मुस्कुराई। “उसे डर से मत मापना। मैंने तुमसे जो पाया, वह मुक्ति है। तुम किसी दिन किसी जीवित इंसान से प्यार करोगे। तब मुझे अपराध मत समझना।”
विवेक रो पड़ा। “तुम्हें भूलना नहीं चाहता।”
“भूलना मत। लेकिन रुकना भी मत।”
सहर पीछे हटने लगी। उसके पिता ने उसका हाथ पकड़ा। प्लेटफॉर्म पर हल्की रोशनी फैलने लगी। घड़ी की सुई पहली बार आगे बढ़ी—2:18।
विवेक ने यह देखा तो उसकी सांस रुक गई।
बीस साल से रुका समय चल पड़ा था।
सहर ने आखिरी बार कहा, “अब यह स्टेशन गायब नहीं होगा। यह याद में रहेगा।”
ट्रेन की सीटी बजी। विवेक कोच में चढ़ गया। जब उसने पीछे देखा, तो प्लेटफॉर्म धुंध में नहीं, रोशनी में घुल रहा था। सहर ने हाथ हिलाया। फिर वह दिखाई देना बंद हो गई।
सुबह ट्रेन नवरंगपुर पहुंची। इस बार विवेक अकेला नहीं था—उसके पास सहर का ब्रोच, उसके पिता की डायरी और अपने भीतर लौटती हिम्मत थी।
कुछ महीनों बाद रूपगढ़ हाल्ट पर memorial बना। बोर्ड पर लिखा गया—
“यह स्टेशन बंद नहीं था। इसका सच बंद था।”
विवेक ने railway corruption और पुराने हादसों पर investigative work शुरू किया। उसने अपने पिता की मौत का case भी फिर से खुलवाया। उसे अब नौकरी से ज्यादा सच की जरूरत थी। वह अक्सर कहता, “मैंने एक ghost station पर जाना सीखा कि कोई भी कहानी सचमुच खत्म नहीं होती, जब तक कोई उसे सुनने वाला न मिले।”
लोग ट्रेन में मिली लड़की की कहानी सुनते हैं और पूछते हैं—क्या सहर सच में भूत थी? क्या वह स्मृति थी? क्या अपराधबोध ने विवेक को वह सब दिखाया?
विवेक हर बार सिर्फ मुस्कुराता है।
क्योंकि कुछ सफर tickets से नहीं, destiny से मिलते हैं।
कुछ स्टेशन maps में नहीं, दिल की बंद जगहों में होते हैं।
और कभी-कभी रात की ट्रेन में मिली एक लड़की हमें प्यार नहीं, मुक्ति सिखाने आती है।
वह अगली सुबह गायब हो जाती है।
लेकिन हमारी जिंदगी में जो घड़ी रुकी होती है—
उसे फिर से चला जाती है।
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