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पृथ्वी का अंतिम दिन

 


उस दिन सुबह दुनिया बिल्कुल सामान्य थी।

लोग अपने-अपने काम में व्यस्त थे। कोई ऑफिस जा रहा था, कोई स्कूल, कोई अपने मोबाइल में खोया हुआ था। लेकिन किसी को नहीं पता था कि यह दिन इतिहास का आखिरी सामान्य दिन होने वाला है।

सुबह 8:17 बजे, पहली अजीब घटना दर्ज हुई।

आसमान का रंग हल्का नीला से बदलकर बैंगनी होने लगा। शुरुआत में लोगों ने इसे प्रदूषण या मौसम का असर समझा, लेकिन कुछ ही मिनटों में यह बदलाव पूरी पृथ्वी पर फैल गया।

सूरज की रोशनी अजीब तरह से टूटने लगी, जैसे वह किसी अदृश्य कांच से होकर गुजर रही हो।

वैज्ञानिकों को तुरंत अलर्ट किया गया।

NASA और अन्य अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों ने डेटा जांचना शुरू किया। लेकिन जो रिपोर्ट सामने आई, उसने सभी के होश उड़ा दिए।

पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र तेजी से कमजोर हो रहा था।

और सबसे डरावनी बात यह थी—

यह प्राकृतिक नहीं था।

दोपहर होते-होते मोबाइल नेटवर्क अचानक बंद होने लगे। इंटरनेट धीमा होकर लगभग खत्म हो गया। टीवी चैनलों पर सिर्फ एक ही संदेश बार-बार दिख रहा था—

"सिस्टम अनस्टेबल है। कृपया सुरक्षित स्थान पर रहें।"

लेकिन कोई नहीं जानता था सुरक्षित स्थान कहां है।

शाम 4 बजे के आसपास, जमीन पर हल्के-हल्के कंपन शुरू हुए। पहले तो लोग इसे भूकंप समझे, लेकिन यह कंपन लगातार बढ़ता गया।

और फिर अचानक आसमान में एक विशाल काली रेखा दिखाई दी।

जैसे किसी ने आकाश को चीर दिया हो।

उस रेखा के अंदर से कोई प्रकाश नहीं था। सिर्फ खालीपन।

दुनिया के हर देश में एक साथ हड़कंप मच गया।

वैज्ञानिकों ने अंतिम रिपोर्ट जारी की—

"पृथ्वी किसी बाहरी शक्ति के संपर्क में है। यह कोई प्राकृतिक आपदा नहीं है। यह एक कोस्मिक इवेंट है।"

रात 7 बजे तक शहर खाली होने लगे।

लोग घरों से बाहर भाग रहे थे, लेकिन कहीं जाने की जगह नहीं थी।

और फिर रात 9 बजे…

समय जैसे रुक गया।

घड़ियां चलना बंद हो गईं।

हवा स्थिर हो गई।

पत्ते हवा में जहां थे, वहीं रुक गए।

पक्षी आसमान में उड़ते हुए जम गए।

पूरा संसार एक तस्वीर बन चुका था।

सिर्फ कुछ लोग ही हिल पा रहे थे।

उनमें से मैं भी था।

मुझे नहीं पता क्यों, लेकिन मैं उस जमे हुए समय में चल सकता था।

मैं सड़कों पर दौड़ता हुआ वैज्ञानिक केंद्र की ओर गया।

वहां मैंने जो देखा, उसने मेरी आत्मा हिला दी।

एक विशाल स्क्रीन पर पृथ्वी का 3D मॉडल दिख रहा था।

उसके चारों ओर एक अज्ञात ऊर्जा घेरा धीरे-धीरे सिकुड़ रहा था।

एक वैज्ञानिक, जो किसी तरह समय के इस जमे हुए पल में भी होश में था, उसने मुझे देखा और कहा—

"तुम आखिरी लोगों में से एक हो जो अभी भी समय में बचे हुए हैं।"

मैंने कांपते हुए पूछा—

"ये सब क्या हो रहा है?"

उसने जवाब दिया—

"पृथ्वी को किसी ने रोका नहीं है… उसे 'सेलेक्ट' किया जा रहा है।"

"सेलेक्ट?"

उसने स्क्रीन की ओर इशारा किया।

"यह कोई विनाश नहीं है… यह अपग्रेड है। पृथ्वी को किसी उच्च सभ्यता द्वारा रीसेट किया जा रहा है।"

मेरे दिमाग में जोर का झटका लगा।

"और बाकी लोग?"

वह चुप हो गया।

फिर धीरे से बोला—

"वे सभी डेटा में बदल चुके हैं… समय रुकते ही।"

मैं भागते हुए बाहर आया।

आसमान में वही काली दरार अब पूरी पृथ्वी को घेर रही थी।

और उसी क्षण मुझे एक आवाज सुनाई दी।

सीधे मेरे दिमाग में।

"पृथ्वी का अंतिम दिन नहीं है… यह पृथ्वी का चयन दिवस है।"

मैं कांप गया।

वह आवाज फिर आई—

"तुम इसलिए जाग रहे हो क्योंकि तुम्हें चुना गया है।"

मैंने ऊपर देखा।

आसमान में पहली बार एक आकृति दिखाई दी।

मानव जैसी नहीं… लेकिन समझने योग्य भी नहीं।

उसकी उपस्थिति ही वास्तविकता को मोड़ रही थी।

उसने कहा—

"तुम्हारी दुनिया अब समाप्त नहीं… परिवर्तित होगी।"

अगले ही पल सब कुछ सफेद हो गया।

मुझे लगा मैं मर गया हूं।

लेकिन जब आंख खुली…

मैं एक नई पृथ्वी पर खड़ा था।

वह पृथ्वी बिल्कुल वैसी थी… लेकिन अलग।

आसमान साफ था, लेकिन उसमें दो सूरज थे।

लोग वही थे… लेकिन उनकी आंखों में अजीब चमक थी।

और सबसे डरावनी बात—

मुझे छोड़कर सबको यह याद ही नहीं था कि कभी कोई “अंतिम दिन” आया था।

मैं अकेला था जो जानता था कि पृथ्वी कभी खत्म हुई थी।

या शायद…

अभी खत्म नहीं हुई है।


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