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रेलवे स्टेशन पर दिखी भूतिया ट्रेन
बरसात की एक ठंडी रात थी। आसमान में काले बादल छाए हुए थे और बीच-बीच में बिजली चमक रही थी। उत्तर भारत के एक छोटे से शहर में स्थित पुराना रेलवे स्टेशन लगभग सुनसान पड़ा था। रात के करीब साढ़े बारह बज चुके थे।
स्टेशन का नाम था "शिवपुर जंक्शन"।
दिन में यहां अच्छी-खासी भीड़ रहती थी, लेकिन आधी रात के बाद पूरा स्टेशन किसी भूतिया जगह जैसा लगने लगता था। प्लेटफॉर्म पर लगे पुराने पीले बल्ब टिमटिमा रहे थे। हवा इतनी तेज चल रही थी कि स्टेशन के कोने में पड़े अखबार उड़कर इधर-उधर जा रहे थे।
उस रात स्टेशन पर केवल तीन लोग मौजूद थे।
पहला था स्टेशन मास्टर सुरेश सिंह।
दूसरा था बूढ़ा चौकीदार रामू काका।
और तीसरा था पत्रकार अर्जुन।
अर्जुन एक स्थानीय अखबार में काम करता था। उसे किसी खबर के सिलसिले में दूसरे शहर जाना था, लेकिन उसकी ट्रेन पांच घंटे लेट थी।
समय काटने के लिए वह स्टेशन मास्टर के कमरे में बैठा हुआ था।
अचानक रामू काका घबराए हुए अंदर आए।
"साहब... फिर से वही ट्रेन दिखाई दी है।"
सुरेश सिंह का चेहरा एकदम पीला पड़ गया।
अर्जुन ने हैरानी से पूछा, "कौन सी ट्रेन?"
दोनों कुछ क्षण चुप रहे।
फिर रामू काका धीमी आवाज में बोले—
"मौत वाली ट्रेन।"
अर्जुन हंस पड़ा।
"ये क्या मजाक है?"
लेकिन सुरेश सिंह नहीं हंसे।
उनकी आंखों में साफ डर दिखाई दे रहा था।
"ये मजाक नहीं है बेटा। पिछले तीस साल से लोग इस ट्रेन की कहानी सुनते आए हैं।"
अर्जुन की उत्सुकता बढ़ गई।
उसने पूछा, "आखिर है क्या ये?"
सुरेश सिंह ने गहरी सांस ली।
"आज से लगभग पैंतीस साल पहले इसी रेलवे लाइन पर एक भयानक हादसा हुआ था।"
"एक एक्सप्रेस ट्रेन तेज बारिश में पुल से नीचे गिर गई थी।"
"उस हादसे में लगभग दो सौ लोगों की मौत हो गई थी।"
कमरे में अचानक सन्नाटा छा गया।
बाहर हवा और तेज हो चुकी थी।
"कहते हैं..." सुरेश सिंह ने धीरे से कहा,
"हर साल कुछ खास रातों में वही ट्रेन वापस आती है।"
अर्जुन मुस्कुराया।
उसे भूत-प्रेत जैसी बातों पर विश्वास नहीं था।
लेकिन अगले कुछ मिनटों में जो हुआ, उसने उसकी पूरी जिंदगी बदल दी।
अचानक स्टेशन के बाहर से ट्रेन की सीटी सुनाई दी।
एक लंबी, भयावह सीटी।
सुरेश सिंह और रामू काका एकदम खड़े हो गए।
"आ गई..." रामू काका बुदबुदाए।
तीनों बाहर भागे।
प्लेटफॉर्म नंबर तीन पर घना कोहरा फैल चुका था।
दूर अंधेरे में एक रोशनी दिखाई दी।
धीरे-धीरे वह रोशनी बड़ी होने लगी।
ट्रेन स्टेशन की ओर आ रही थी।
लेकिन कुछ अजीब था।
स्टेशन के कंट्रोल पैनल में उसका कोई रिकॉर्ड नहीं था।
कोई सिग्नल नहीं मिला था।
रेलवे नेटवर्क पर उसका कोई नाम नहीं था।
फिर भी ट्रेन पूरी रफ्तार से प्लेटफॉर्म की ओर बढ़ रही थी।
अर्जुन ने कैमरा निकाला।
जैसे ही ट्रेन करीब आई, उसके रोंगटे खड़े हो गए।
ट्रेन बिल्कुल पुरानी थी।
जंग लगी हुई।
टूटे हुए शीशे।
और हर डिब्बे पर मिट्टी जमी हुई थी।
ऐसा लग रहा था जैसे वह कई दशकों से किसी कब्र में दबी हो।
ट्रेन धीरे-धीरे प्लेटफॉर्म पर रुक गई।
लेकिन सबसे डरावनी बात अभी बाकी थी।
सभी खिड़कियों में लोग बैठे हुए दिखाई दे रहे थे।
सैकड़ों यात्री।
लेकिन कोई भी हिल नहीं रहा था।
सबकी आंखें एक ही दिशा में टिकी हुई थीं।
जैसे पत्थर की मूर्तियां हों।
अर्जुन ने कैमरा ज़ूम किया।
और उसके हाथ कांपने लगे।
यात्रियों के चेहरे सामान्य नहीं थे।
उनके चेहरे पीले थे।
आंखें काली थीं।
और कई चेहरों पर चोट के निशान दिखाई दे रहे थे।
जैसे वे किसी भयानक दुर्घटना का शिकार हुए हों।
अचानक एक डिब्बे का दरवाजा खुला।
चीईईईं...
धातु की भयानक आवाज पूरे स्टेशन में गूंज उठी।
भीतर से एक आदमी उतरा।
उसने फटी हुई रेलवे यूनिफॉर्म पहन रखी थी।
उसका चेहरा आधा जला हुआ था।
वह धीरे-धीरे अर्जुन की ओर बढ़ा।
हर कदम के साथ उसके जूतों से पानी टपक रहा था।
हालांकि कई घंटों से बारिश बंद हो चुकी थी।
अर्जुन पीछे हट गया।
"तुम... कौन हो?"
आदमी मुस्कुराया।
उसकी मुस्कान इंसानी नहीं थी।
"हम घर जाना चाहते हैं..."
उसने धीमी आवाज में कहा।
"लेकिन रास्ता भूल गए हैं।"
अर्जुन का गला सूख गया।
तभी पूरे प्लेटफॉर्म पर अचानक ठंडी हवा चलने लगी।
सभी डिब्बों की खिड़कियों से एक साथ चेहरे बाहर झांकने लगे।
सैकड़ों आंखें।
सिर्फ अर्जुन को देख रही थीं।
फिर अचानक ट्रेन के भीतर से रोने, चिल्लाने और मदद मांगने की आवाजें आने लगीं।
"बचाओ..."
"दरवाजा खोलो..."
"हमें बाहर निकालो..."
अर्जुन के कान सुन्न हो गए।
वह भागने ही वाला था कि उसे ट्रेन के आखिरी डिब्बे में एक छोटी लड़की दिखाई दी।
वह खिड़की के पास खड़ी थी।
बाकी यात्रियों से अलग।
उसकी आंखों में डर था।
वह धीरे-धीरे हाथ हिला रही थी।
जैसे मदद मांग रही हो।
अर्जुन का दिल तेजी से धड़कने लगा।
कुछ उसे उस लड़की की ओर खींच रहा था।
वह सावधानी से आखिरी डिब्बे के पास पहुंचा।
जैसे ही उसने भीतर झांका, उसे एक पुरानी डायरी दिखाई दी।
डायरी सीट पर पड़ी थी।
उसने तुरंत उसे उठा लिया।
उसी क्षण लड़की गायब हो गई।
और पूरा डिब्बा खाली हो गया।
अचानक ट्रेन ने जोरदार सीटी मारी।
पूरे प्लेटफॉर्म की लाइटें बुझ गईं।
घना अंधेरा।
कुछ सेकंड बाद जब रोशनी वापस आई—
ट्रेन गायब थी।
पूरी ट्रेन।
जैसे वह कभी वहां आई ही न हो।
पटरियां खाली थीं।
सन्नाटा था।
लेकिन अर्जुन के हाथ में वह डायरी अब भी मौजूद थी।
अगले दिन उसने डायरी पढ़नी शुरू की।
डायरी उसी दुर्घटना की थी।
उसे एक बारह साल की लड़की ने लिखा था।
आखिरी पन्ने पर लिखा था—
"अगर कोई यह डायरी पढ़ रहा है तो कृपया हमारे बारे में दुनिया को बताना। हम अभी भी फंसे हुए हैं।"
अर्जुन की आंखें नम हो गईं।
उसने दुर्घटना की पूरी जांच शुरू कर दी।
कई महीनों की मेहनत के बाद उसे एक चौंकाने वाला सच पता चला।
हादसे के बाद कई शव कभी मिले ही नहीं थे।
उनकी पहचान तक नहीं हो पाई थी।
उनकी आत्माओं का अंतिम संस्कार भी नहीं हुआ था।
शायद यही कारण था कि वे अब भी भटक रही थीं।
अर्जुन ने प्रशासन की मदद से उन सभी मृतकों की याद में एक स्मारक बनवाया।
विशेष पूजा और श्रद्धांजलि समारोह आयोजित किया गया।
सैकड़ों परिवार वहां पहुंचे।
लोगों ने अपने खोए हुए प्रियजनों को याद किया।
उस रात पहली बार सब कुछ शांत था।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।
एक साल बाद।
उसी तारीख पर।
उसी समय।
अर्जुन फिर शिवपुर स्टेशन पहुंचा।
वह जानना चाहता था कि क्या अब भी वह ट्रेन लौटेगी।
रात के ठीक 12:37 बजे दूर से फिर सीटी सुनाई दी।
उसका दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।
कोहरा फैलने लगा।
लेकिन इस बार जब ट्रेन आई—
वह पहले जैसी नहीं थी।
अब वह चमक रही थी।
उसके डिब्बे साफ थे।
खिड़कियों में बैठे लोग मुस्कुरा रहे थे।
और वही छोटी लड़की खिड़की से हाथ हिला रही थी।
इस बार उसकी आंखों में डर नहीं था।
सिर्फ शांति थी।
कुछ सेकंड बाद ट्रेन धीरे-धीरे आगे बढ़ी।
अंधेरे में गायब हो गई।
और फिर कभी वापस नहीं आई।
लेकिन आज भी शिवपुर जंक्शन के कुछ पुराने कर्मचारी दावा करते हैं कि बरसात की रातों में कभी-कभी दूर पटरियों से एक रहस्यमयी सीटी सुनाई देती है।
और जब वह सीटी सुनाई देती है...
तो लोग अनजाने में पटरियों की ओर देखने लगते हैं।
क्योंकि कहीं न कहीं उन्हें लगता है कि शायद वह भूतिया ट्रेन अब भी अपने अंतिम सफर पर है.
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