मेरे पति की पहली पत्नी जिंदा थी
शादी के बाद हर लड़की अपने नए घर में सपने लेकर जाती है। कोई प्यार की उम्मीद लेकर, कोई सम्मान की, कोई एक नए जीवन की शुरुआत के भरोसे। लेकिन रूहानी चौहान को नहीं पता था कि जिस घर की देहरी वह दुल्हन बनकर पार कर रही है, वहां उसका इंतजार सुहागरात नहीं, बल्कि एक अधूरी औरत की चीख कर रही थी।
रूहानी की शादी आदित्य मल्होत्रा से हुई थी। आदित्य शहर का जाना-माना बिजनेसमैन था। उसकी उम्र करीब पैंतीस साल थी। वह खूबसूरत, शांत और बहुत सलीकेदार आदमी था। उसकी बातें मीठी थीं, चाल-ढाल में आत्मविश्वास था और आंखों में एक ऐसी गहराई, जो किसी को भी अपनी तरफ खींच ले।
रूहानी एक स्कूल टीचर थी। सीधी, संवेदनशील और समझदार। उसके माता-पिता ने जब आदित्य का रिश्ता देखा, तो उन्हें लगा कि उनकी बेटी की जिंदगी सुरक्षित हाथों में जा रही है। हां, एक बात सबको पता थी—आदित्य पहले भी शादीशुदा था। उसकी पहली पत्नी, काव्या, तीन साल पहले एक पहाड़ी सड़क दुर्घटना में मर गई थी।
आदित्य ने खुद रूहानी से कहा था, “मैंने काव्या को खोया है, लेकिन जिंदगी हमेशा रुकती नहीं। मैं तुम्हारे साथ ईमानदारी से नया रिश्ता शुरू करना चाहता हूं।”
रूहानी ने उसकी आंखों में दर्द देखा और भरोसा कर लिया।
शादी बहुत खूबसूरती से हुई। मल्होत्रा परिवार का बड़ा बंगला रोशनी से सज गया। रिश्तेदार, संगीत, मेहमान, फूल—हर चीज किसी फिल्मी शादी जैसी लग रही थी। आदित्य की मां, मीना मल्होत्रा, हर रस्म में रूहानी को प्यार से गले लगाती रहीं। आदित्य की छोटी बहन शनाया भी उसे “भाभी” कहकर बार-बार चिढ़ाती।
सब कुछ इतना सामान्य था कि रूहानी के मन में कोई शक पैदा ही नहीं हुआ।
लेकिन शादी की पहली रात ही उसे इस घर की पहली दरार दिखाई दी।
रूहानी जब अपने कमरे में पहुंची, तो कमरा गुलाबों से सजा था। बिस्तर पर लाल पंखुड़ियां बिखरी थीं। अलमारी के पास आदित्य खड़ा था। उसने मुस्कुराकर कहा, “आज से यह कमरा तुम्हारा है।”
रूहानी ने कमरे को देखा। दीवार पर कुछ तस्वीरों की जगह खाली थी। ऐसा लग रहा था जैसे वहां पहले फ्रेम टंगे थे, जिन्हें हाल ही में हटाया गया हो।
“यहां क्या था?” रूहानी ने पूछा।
आदित्य पल भर के लिए चुप हो गया। फिर बोला, “पुरानी पेंटिंग्स थीं। कमरे को नया करवाया है।”
रूहानी ने बात वहीं छोड़ दी।
रात को जब आदित्य सो गया, रूहानी की नींद अचानक खुली। उसे लगा जैसे कमरे के बाहर कोई धीरे-धीरे चल रहा है। उसने घड़ी देखी—रात के दो बज रहे थे।
वह उठी और दरवाजे तक गई। बाहर लंबा कॉरिडोर अंधेरे में डूबा था। आखिरी छोर पर एक कमरा था, जिसका दरवाजा हल्का-सा खुला था। अंदर से पीली रोशनी आ रही थी।
रूहानी धीरे-धीरे उस तरफ बढ़ी। जैसे ही उसने दरवाजा धकेला, अंदर की हवा में पुरानी खुशबू फैल गई—जैसे किसी औरत का परफ्यूम वर्षों से कमरे में बंद हो।
कमरे में सफेद चादरों से ढका फर्नीचर था। दीवार पर एक बड़ी तस्वीर टंगी थी। रूहानी ने चादर हटाई और तस्वीर को देखा।
तस्वीर में एक सुंदर लड़की मुस्कुरा रही थी।
नीचे लिखा था—“काव्या मल्होत्रा।”
रूहानी को लगा यह आदित्य की पहली पत्नी की तस्वीर होगी। उसने तस्वीर को गौर से देखा। काव्या बेहद सुंदर थी, लेकिन उसकी आंखों में अजीब-सी उदासी थी।
अचानक पीछे से आवाज आई, “तुम यहां क्या कर रही हो?”
रूहानी घबराकर पलटी। आदित्य दरवाजे पर खड़ा था। उसका चेहरा गुस्से से भरा था।
“मैं... बस आवाज सुनकर आई थी,” रूहानी ने धीरे से कहा।
आदित्य ने सख्त आवाज में कहा, “यह कमरा बंद रहता है। यहां दोबारा मत आना।”
रूहानी ने पहली बार आदित्य की आंखों में वह कठोरता देखी, जो उसने पहले कभी नहीं देखी थी।
अगले दिन नाश्ते की मेज पर सब सामान्य दिखने की कोशिश कर रहे थे। मीना जी ने प्यार से पूछा, “बेटा, नींद ठीक से आई?”
रूहानी मुस्कुराई, “जी।”
लेकिन उसका मन अब शांत नहीं था।
कुछ दिन बीते। आदित्य उसके साथ अच्छा व्यवहार करता, उसे घुमाने ले जाता, उसके लिए गिफ्ट लाता, लेकिन जब भी काव्या का नाम आता, वह चुप हो जाता। घर के लोग भी जैसे उस नाम से डरते थे।
एक दिन रूहानी ने शनाया से पूछा, “काव्या भाभी कैसी थीं?”
शनाया के हाथ से चाय का कप लगभग छूट गया। उसने तुरंत कहा, “मुझे ज्यादा याद नहीं।”
“लेकिन तीन साल पहले ही तो...”
शनाया ने बात काट दी। “भाभी, प्लीज। इस घर में उनका नाम लेना अच्छा नहीं माना जाता।”
“क्यों?”
शनाया की आंखों में डर तैर गया। “क्योंकि कुछ लोग मरकर भी घर नहीं छोड़ते।”
इतना कहकर वह चली गई।
रूहानी की बेचैनी अब शक में बदलने लगी थी।
एक दोपहर जब घर में कोई नहीं था, रूहानी फिर उसी बंद कमरे में गई। इस बार दरवाजा बंद नहीं था। कमरे की अलमारी में पुराने कपड़े, कुछ किताबें और एक लकड़ी का छोटा बॉक्स रखा था। बॉक्स पर ताला लगा था। रूहानी ने उसे खोलने की कोशिश नहीं की, लेकिन तभी उसकी नजर अलमारी के नीचे गिरे एक कागज पर पड़ी।
वह एक पुरानी मेडिकल रिपोर्ट थी।
रिपोर्ट काव्या मल्होत्रा के नाम पर थी। तारीख उस कथित एक्सीडेंट से सिर्फ दस दिन पहले की थी।
रूहानी ने रिपोर्ट पढ़ी और उसका दिल धड़कना भूल गया।
काव्या गर्भवती थी।
तीन महीने की।
रूहानी ने रिपोर्ट को हाथ में पकड़ लिया। आदित्य ने कभी यह बात नहीं बताई थी कि उसकी पहली पत्नी मां बनने वाली थी।
उसी समय पीछे से नौकरानी सुशीला काकी आ गईं। उन्होंने रूहानी के हाथ में रिपोर्ट देखी तो उनका चेहरा सफेद पड़ गया।
“बहूरानी, इसे जहां से उठाया है, वहीं रख दीजिए,” उन्होंने घबराकर कहा।
रूहानी ने पूछा, “काकी, काव्या जी गर्भवती थीं?”
सुशीला काकी की आंखें भर आईं। उन्होंने धीरे से कहा, “हां।”
“फिर आदित्य ने मुझे क्यों नहीं बताया?”
काकी ने दरवाजा बंद किया और फुसफुसाईं, “क्योंकि इस घर में काव्या बहू की मौत की कहानी पूरी नहीं है।”
रूहानी की सांस रुक गई। “क्या मतलब?”
काकी ने कांपती आवाज में कहा, “सब कहते हैं काव्या बहू पहाड़ी रास्ते पर एक्सीडेंट में मर गईं। लेकिन मैंने उनकी लाश कभी नहीं देखी। घर में कोई अंतिम दर्शन नहीं हुआ। बस एक बंद ताबूत आया और जल्दी-जल्दी अंतिम संस्कार कर दिया गया।”
“आपको लगता है कि वे मरी नहीं थीं?”
सुशीला काकी कुछ बोलतीं, उससे पहले बाहर गाड़ी रुकने की आवाज आई। आदित्य घर लौट आया था।
काकी तुरंत पीछे हट गईं। “मैंने कुछ नहीं कहा, बहूरानी। कृपया मेरा नाम मत लेना।”
उस रात रूहानी ने आदित्य से सीधे पूछा, “काव्या गर्भवती थीं?”
आदित्य चुप हो गया। उसके चेहरे पर दुख नहीं, बेचैनी थी।
“तुमने मुझे ये बात क्यों नहीं बताई?” रूहानी ने पूछा।
आदित्य ने धीमे स्वर में कहा, “क्योंकि वह मेरे जीवन का सबसे दर्दनाक हिस्सा है।”
“तुम्हारा बच्चा भी चला गया था।”
आदित्य ने आंखें बंद कर लीं। “हां।”
“तुमने उनकी लाश देखी थी?”
आदित्य ने तुरंत आंखें खोलीं। “ये सवाल किसने तुम्हारे मन में डाला?”
“सच जानने के लिए किसी की जरूरत नहीं होती।”
आदित्य ने गुस्से में कहा, “रूहानी, मैं तुम्हारा पति हूं। तुम्हें मुझ पर भरोसा करना चाहिए।”
रूहानी ने शांत स्वर में कहा, “भरोसा सच पर होता है, छुपाव पर नहीं।”
उस रात दोनों के बीच पहली बार दूरी आ गई।
कुछ दिन बाद रूहानी को एक अनजान नंबर से मैसेज आया।
“अगर जिंदा रहना चाहती हो तो काव्या का सच मत पूछो।”
रूहानी का दिल कांप गया। उसने नंबर मिलाया, लेकिन फोन बंद था।
अगले दिन स्कूल से लौटते समय एक बाइक सवार ने उसकी स्कूटी को टक्कर मारने की कोशिश की। वह बाल-बाल बची। उसे साफ समझ आ गया कि कोई उसे डराना चाहता है।
लेकिन अब वह पीछे हटने वाली नहीं थी।
रूहानी ने काव्या के मायके का पता ढूंढा। बहुत कोशिश के बाद उसे पता चला कि काव्या की मां, सुधा अरोड़ा, शहर के पुराने इलाके में अकेली रहती हैं। रूहानी बिना किसी को बताए वहां पहुंची।
सुधा जी ने दरवाजा खोला। जब रूहानी ने अपना परिचय दिया, तो उनके चेहरे पर दर्द उतर आया।
“तुम आदित्य की दूसरी पत्नी हो?” उन्होंने पूछा।
“जी।”
सुधा जी कुछ देर उसे देखती रहीं। फिर बोलीं, “तुम्हें भी सच नहीं बताया गया?”
रूहानी ने धीरे से कहा, “मुझे सच चाहिए।”
सुधा जी की आंखों से आंसू बह निकले। “मेरी बेटी मरी नहीं थी।”
रूहानी का दिल जोर से धड़का। “क्या?”
“उसने मुझे एक्सीडेंट से एक दिन पहले फोन किया था। वह रो रही थी। उसने कहा था—मां, अगर मैं गायब हो जाऊं तो समझना कि आदित्य और उसके घरवालों ने मुझे छुपा दिया है।”
“क्यों?”
सुधा जी ने एक पुरानी डायरी निकालकर रूहानी को दी। “काव्या को आदित्य के बिजनेस का एक बड़ा राज पता चल गया था। मल्होत्रा ग्रुप दवाइयों की नकली सप्लाई में शामिल था। गरीब मरीजों को नकली इंजेक्शन बेचे जा रहे थे। काव्या डॉक्टर थी। उसने दस्तावेज देख लिए थे।”
रूहानी सन्न रह गई।
“काव्या ने पुलिस में जाने की बात की,” सुधा जी बोलीं, “और फिर अगले दिन खबर आई कि उसका एक्सीडेंट हो गया।”
“लेकिन अगर वह जिंदा है तो कहां है?”
सुधा जी ने कांपते हाथों से एक कागज दिया। “मुझे हर साल उसके जन्मदिन पर एक खाली लिफाफा आता है। अंदर सिर्फ एक सूखा हुआ नीला फूल होता है। बचपन में काव्या मुझे वही फूल दिया करती थी। मुझे लगता है वह जिंदा है, लेकिन कैद में है। या किसी जगह छिपाई गई है।”
रूहानी ने कागज पर भेजने की जगह देखी। पोस्टमार्क एक छोटे पहाड़ी कस्बे “देवगिरि” का था।
यही वही जगह थी, जहां काव्या का एक्सीडेंट बताया गया था।
रूहानी ने तय कर लिया कि वह देवगिरि जाएगी।
वह आदित्य से झूठ बोलकर स्कूल की ट्रेनिंग के नाम पर घर से निकली और देवगिरि पहुंची। पहाड़ी कस्बा शांत था, लेकिन उसमें एक अजीब डर था। वहां पुराने मिशन अस्पताल के बारे में पूछने पर लोग बात टाल देते। काव्या के भेजे गए लिफाफे पर जिस इलाके की मुहर थी, वह उसी अस्पताल के पास का था।
रूहानी अस्पताल पहुंची। वहां अब बहुत कम लोग आते थे। रिसेप्शन पर बैठे बूढ़े कंपाउंडर ने पहले तो कुछ नहीं बताया, लेकिन जब रूहानी ने काव्या की तस्वीर दिखाई, तो उसका चेहरा बदल गया।
“यह नाम मत लो,” उसने कहा।
“क्यों?”
वह धीरे से बोला, “तीन साल पहले एक घायल औरत यहां लाई गई थी। सबने कहा वह सड़क हादसे में मिली है। लेकिन उसके शरीर पर ऐसे निशान थे जैसे उसे बांधा गया हो।”
“वह काव्या थी?”
कंपाउंडर ने हां में सिर हिलाया। “वह जिंदा थी। गर्भवती भी थी। लेकिन रात में कुछ लोग आए और उसे अस्पताल से ले गए।”
“कौन लोग?”
“मल्होत्रा परिवार के आदमी। और एक डॉक्टर।”
रूहानी ने पूछा, “कहां ले गए?”
कंपाउंडर ने खिड़की से बाहर पहाड़ी की तरफ इशारा किया। “ऊपर एक पुराना वेलनेस सेंटर है। नाम है शांतिधाम। पहले मानसिक रोगियों का इलाज होता था। अब बंद बताया जाता है, लेकिन रात में वहां रोशनी जलती है।”
रूहानी के शरीर में सिहरन दौड़ गई।
वह उसी शाम शांतिधाम पहुंची। पहाड़ी पर बना वह पुराना भवन बाहर से खंडहर जैसा था। लोहे का गेट बंद था। लेकिन अंदर सचमुच हल्की रोशनी थी।
रूहानी ने पीछे की टूटी दीवार से अंदर प्रवेश किया। गलियारे में दवाइयों की गंध थी। कुछ कमरे बंद थे। एक कमरे से किसी औरत के खांसने की आवाज आई।
रूहानी ने धीरे से दरवाजा खोला।
अंदर एक कमजोर, पीली, लेकिन जिंदा औरत बैठी थी।
उसकी आंखें गहरी थीं। चेहरा बहुत बदला हुआ था, लेकिन तस्वीर से मिल रहा था।
वह काव्या थी।
रूहानी की आंखों में आंसू आ गए। “काव्या?”
औरत ने धीरे से सिर उठाया। “तुम कौन हो?”
“मैं रूहानी हूं... आदित्य की पत्नी।”
काव्या के चेहरे पर दर्द और डर एक साथ आ गया। “तुम्हें यहां नहीं आना चाहिए था।”
रूहानी उसके पास बैठ गई। “आप जिंदा हैं। सबने कहा आप मर चुकी हैं।”
काव्या की आंखों से आंसू बह निकले। “मेरी मौत झूठी थी। आदित्य ने मुझे नहीं बचाया। उसने मुझे छुपाया।”
“क्यों?”
काव्या ने कांपती आवाज में कहा, “क्योंकि मैंने उसके बिजनेस का सच जान लिया था। नकली दवाइयों का धंधा आदित्य के पिता ने शुरू किया था। आदित्य पहले इसका हिस्सा नहीं था, लेकिन बाद में वह भी चुप रहा। मैंने पुलिस में जाने की धमकी दी। उसी रात मुझे पहाड़ी रास्ते पर धक्का दिया गया। मैं बच गई, लेकिन उन्होंने मुझे मर चुका घोषित कर दिया।”
“आपका बच्चा?”
काव्या की आंखों में ऐसा दर्द आया, जिसे शब्द नहीं संभाल सकते थे।
“बच्चा जन्म के बाद मुझसे छीन लिया गया।”
रूहानी के मुंह से आवाज नहीं निकली।
“वह जिंदा है?” उसने बहुत धीरे पूछा।
काव्या ने सिर हिलाया। “हां। मुझे बस इतना पता है कि वह एक लड़की है। आदित्य की मां उसे किसी अनाथालय में छोड़ आई थी, ताकि कोई उसे काव्या की बेटी समझकर सच तक न पहुंच सके।”
रूहानी का दिल टूट गया। “आप इतने साल यहां कैसे रहीं?”
काव्या ने अपनी कलाई दिखाई। उस पर इंजेक्शन के निशान थे। “दवाइयां देकर मुझे कमजोर रखा गया। दुनिया को कहा गया मैं मर गई हूं। मां को डराने के लिए खाली लिफाफे भेजे जाते रहे, ताकि वह पागल लगें अगर कभी सच बोलें।”
तभी बाहर कदमों की आवाज आई।
रूहानी ने काव्या को चुप रहने का इशारा किया। दरवाजा खुला।
आदित्य सामने खड़ा था।
उसके पीछे उसकी मां मीना और दो आदमी खड़े थे।
आदित्य की आंखों में हैरानी नहीं थी। जैसे उसे पता था कि रूहानी यहां पहुंच जाएगी।
“तुम बहुत आगे आ गई, रूहानी,” उसने शांत आवाज में कहा।
रूहानी खड़ी हो गई। “तुमने अपनी पत्नी को तीन साल तक कैद रखा?”
आदित्य ने कहा, “मैंने उसे नहीं मारा।”
काव्या चीखी, “लेकिन तुमने मुझे बचाया भी नहीं!”
आदित्य का चेहरा टूट गया। “मैं मजबूर था।”
रूहानी ने गुस्से से कहा, “मजबूरी और अपराध में फर्क होता है, आदित्य।”
मीना मल्होत्रा आगे आईं। “हमने यह सब परिवार को बचाने के लिए किया।”
“परिवार?” रूहानी ने कहा। “एक गर्भवती औरत को कैद करना, उसकी बेटी छीनना, उसकी मां को झूठी उम्मीदों में जलाना—यह परिवार है?”
मीना का चेहरा पत्थर जैसा था। “बिजनेस डूब जाता तो हजारों लोग सड़क पर आ जाते।”
काव्या ने धीमे लेकिन साफ स्वर में कहा, “नकली दवाइयों से कितने लोग मरे, उनका क्या?”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
आदित्य ने रूहानी से कहा, “मैं तुम्हें चोट नहीं पहुंचाना चाहता। तुम घर चलो। हम सब ठीक कर देंगे।”
रूहानी ने कहा, “किसे ठीक करोगे? काव्या की जिंदगी? उसकी बेटी? उसके नाम पर हुआ झूठा अंतिम संस्कार?”
आदित्य की आंखें भर आईं। “मैंने तुमसे सच में प्यार किया है।”
रूहानी ने जवाब दिया, “प्यार सच से डरता नहीं।”
उसी पल बाहर से पुलिस सायरन की आवाज आई।
मीना घबरा गईं। “ये क्या किया तुमने?”
रूहानी ने अपना फोन दिखाया। “देवगिरि आने से पहले मैंने सारी जानकारी अपने वकील दोस्त को भेज दी थी। और यहां आते ही लाइव लोकेशन पुलिस को भेजी।”
दरवाजा टूटकर खुला। पुलिस अंदर आई। मीना, आदित्य और उनके लोगों को हिरासत में लिया गया। शांतिधाम के बंद कमरों से कई दस्तावेज मिले—नकली दवा सप्लाई के रिकॉर्ड, काव्या के इलाज की फर्जी फाइलें और उस बच्ची के अनाथालय का कागज भी।
कुछ दिनों में मामला पूरे देश में फैल गया। मल्होत्रा परिवार का साम्राज्य गिरने लगा। जांच में सामने आया कि कई अस्पतालों में नकली दवाइयों की सप्लाई हुई थी। आदित्य ने सीधे हत्या नहीं की थी, लेकिन उसने अपराध छिपाने में साथ दिया था। मीना मल्होत्रा और कंपनी के पुराने डायरेक्टर्स पर अपहरण, फर्जी मृत्यु प्रमाणपत्र, अवैध कैद और आपराधिक साजिश के आरोप लगे।
सबसे भावुक दिन वह था जब काव्या अपनी बेटी से मिली।
बच्ची का नाम अनाथालय में “आर्या” रखा गया था। वह करीब तीन साल की थी। उसे नहीं पता था कि उसकी मां कौन है। जब काव्या ने उसे पहली बार गोद में लिया, तो वह फूट-फूटकर रो पड़ी।
रूहानी थोड़ी दूर खड़ी सब देख रही थी। उसकी अपनी शादी टूट चुकी थी, लेकिन उसके सामने एक मां की दुनिया जुड़ रही थी।
कुछ महीनों बाद अदालत ने काव्या को कानूनी रूप से जीवित घोषित किया। उसके नाम से जारी मृत्यु प्रमाणपत्र रद्द किया गया। आर्या की कस्टडी काव्या को मिली। मीना मल्होत्रा को लंबी सजा हुई। आदित्य ने अदालत में अपराध स्वीकार किया, लेकिन रूहानी ने उसे माफ नहीं किया।
अदालत के बाहर आदित्य ने आखिरी बार रूहानी से कहा, “क्या हमारे बीच कुछ भी सच नहीं था?”
रूहानी ने उसकी तरफ देखा। उसकी आंखों में आंसू थे, लेकिन आवाज मजबूत थी।
“मेरी तरफ से सब सच था, आदित्य। तुम्हारी तरफ से प्यार था शायद, लेकिन सच नहीं था। और झूठ पर बना प्यार घर नहीं बनाता, जेल बनाता है।”
आदित्य सिर झुकाकर पुलिस वैन में बैठ गया।
रूहानी ने मल्होत्रा हाउस लौटकर अपना सामान लिया। वही घर, जहां वह दुल्हन बनकर आई थी, अब खाली और ठंडा लग रहा था। दीवारें, झूमर, महंगे फर्नीचर—सब उसे नकली लगे। उसने अपनी शादी की तस्वीर उतारी, कुछ पल देखती रही, फिर उसे मेज पर रख दिया।
दरवाजे से निकलते समय सुशीला काकी ने उसका हाथ पकड़ लिया। “बहूरानी, आपने इस घर का अंधेरा खत्म कर दिया।”
रूहानी ने धीरे से कहा, “नहीं काकी, अंधेरा तब खत्म होता है जब लोग चुप रहना बंद कर देते हैं।”
एक साल बाद रूहानी ने स्कूल की नौकरी के साथ-साथ महिलाओं के लिए एक कानूनी सहायता संस्था शुरू की। उसका नाम रखा—“सच की आवाज।”
काव्या भी धीरे-धीरे ठीक होने लगी। उसका शरीर कमजोर था, लेकिन मन में अब डर नहीं था। आर्या उसके साथ रहती थी। सुधा जी अपनी बेटी और नातिन को देखकर हर दिन भगवान का धन्यवाद करतीं।
रूहानी और काव्या के बीच एक अनोखा रिश्ता बन गया। वे सौतन नहीं थीं। वे दो औरतें थीं, जिन्हें एक ही झूठ ने अलग-अलग तरीके से चोट पहुंचाई थी।
एक दिन काव्या ने रूहानी से कहा, “तुम चाहतीं तो मुझे देखकर खुद टूट जातीं। लेकिन तुमने मुझे बचाया।”
रूहानी मुस्कुराई। “शायद मुझे तुम्हें बचाने के लिए ही उस घर में भेजा गया था।”
काव्या ने आर्या को गोद में लेते हुए कहा, “तुम्हारी जिंदगी आगे बहुत सुंदर होगी।”
रूहानी ने खिड़की से बाहर देखा। बारिश हो रही थी। वही बारिश, जिसके दिन वह दुल्हन बनकर मल्होत्रा हाउस आई थी। फर्क बस इतना था कि उस दिन वह झूठ के घर में जा रही थी, और आज सच की दुनिया में खड़ी थी।
उसने धीरे से कहा, “अब मेरी जिंदगी किसी के नाम से नहीं, मेरे अपने सच से शुरू होगी।”
और सच में, रूहानी की कहानी वहीं खत्म नहीं हुई।
वह वहीं से शुरू हुई।

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