समानांतर दुनिया में मिला मेरा दूसरा रूप


 मैं हमेशा से विज्ञान और ब्रह्मांड से जुड़ी रहस्यमयी बातों में दिलचस्पी रखता था। बचपन से ही मुझे यह सवाल परेशान करता था कि क्या इस विशाल ब्रह्मांड में कहीं मेरी तरह कोई और भी मौजूद हो सकता है? क्या कोई ऐसी दुनिया है जहां मेरी जिंदगी बिल्कुल अलग तरीके से चल रही हो? उस समय ये बातें सिर्फ कल्पना लगती थीं, लेकिन एक रात मेरे साथ जो हुआ, उसने मेरी सोच हमेशा के लिए बदल दी।

उस रात मैं अपने कमरे में अकेला था। बाहर तेज बारिश हो रही थी। बिजली कई बार जा चुकी थी और पूरा मोहल्ला अंधेरे में डूबा हुआ था। रात के करीब दो बजे अचानक मेरे कंप्यूटर की स्क्रीन अपने आप चालू हो गई। मैंने सोचा शायद बिजली के उतार-चढ़ाव की वजह से ऐसा हुआ होगा, लेकिन अगले ही पल स्क्रीन पर अजीब से चिन्ह दिखाई देने लगे।

वे किसी भाषा जैसे लग रहे थे, लेकिन मैं उन्हें समझ नहीं पा रहा था।

फिर अचानक स्क्रीन पूरी तरह सफेद हो गई।

कमरे में एक तेज चमक फैल गई।

मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे मेरे पैरों के नीचे की जमीन गायब हो रही हो। मेरे कानों में तेज आवाज गूंजने लगी और कुछ सेकंड बाद सब कुछ शांत हो गया।

जब मैंने आंखें खोलीं तो मैं अपने कमरे में नहीं था।

मैं एक ऐसी जगह खड़ा था जो पहली नजर में मेरे शहर जैसी ही लग रही थी, लेकिन कुछ अलग था। सड़कें अधिक साफ थीं। आसमान का रंग हल्का बैंगनी दिखाई दे रहा था। इमारतों पर अजीब प्रकार की रोशनी चमक रही थी।

मैं घबराकर इधर-उधर देखने लगा।

तभी मेरी नजर सामने लगे एक बड़े डिजिटल बोर्ड पर पड़ी।

उस पर तारीख वही थी, लेकिन वर्ष अलग था।

मैं समझ नहीं पा रहा था कि यह सपना है या हकीकत।

तभी सड़क के दूसरी ओर खड़े एक आदमी ने मेरी तरफ देखा।

उसे देखते ही मेरा दिल रुकने जैसा हो गया।

वह बिल्कुल मेरी तरह दिखता था।

वही चेहरा।

वही आंखें।

वही कद।

यहां तक कि उसके चेहरे पर मौजूद छोटा सा निशान भी बिल्कुल मेरी तरह था।

मैं कुछ पल तक उसे देखता रह गया।

वह भी मुझे देखकर उतना ही हैरान था।

फिर वह धीरे-धीरे मेरी तरफ बढ़ा।

"आखिर तुम आ ही गए," उसने कहा।

उसकी आवाज भी मेरी ही जैसी थी।

"तुम... कौन हो?" मैंने कांपती आवाज में पूछा।

वह हल्का सा मुस्कुराया।

"मैं तुम हूं। लेकिन उस दुनिया का नहीं, जहां से तुम आए हो।"

मेरे शरीर में सिहरन दौड़ गई।

उसने मुझे एक सुनसान इमारत में ले जाकर बैठाया और फिर जो कहानी सुनाई, उसने मेरे होश उड़ा दिए।

उसने बताया कि ब्रह्मांड केवल एक नहीं है। अनगिनत समानांतर दुनियाएं मौजूद हैं। हर दुनिया में हमारे अलग-अलग रूप रहते हैं। कहीं हम अमीर होते हैं, कहीं गरीब। कहीं सफल, कहीं असफल। कहीं जिंदा, कहीं मृत।

लेकिन समस्या यह थी कि इन दुनियाओं के बीच की सीमाएं कमजोर होने लगी थीं।

और यही कारण था कि मैं वहां पहुंच गया था।

"लेकिन मैं ही क्यों?" मैंने पूछा।

उसके चेहरे पर चिंता दिखाई दी।

"क्योंकि हमारी दुनियाओं के बीच एक दरार बन चुकी है। और अगर वह दरार बढ़ती गई, तो दोनों दुनियाएं टकरा सकती हैं।"

मैं उसकी बात समझने की कोशिश कर ही रहा था कि तभी बाहर जोरदार धमाका हुआ।

खिड़की के शीशे कांप उठे।

मेरा दूसरा रूप अचानक गंभीर हो गया।

"वे हमें ढूंढ़ चुके हैं।"

"कौन?"

उसने जवाब नहीं दिया।

वह तेजी से खिड़की के पास गया।

मैंने बाहर देखा।

सड़क पर काले कपड़े पहने कुछ लोग खड़े थे।

लेकिन उनकी सबसे डरावनी बात यह थी कि उनके चेहरे नहीं थे।

उनकी जगह सिर्फ धुंध जैसी परछाइयां थीं।

"ये कौन हैं?" मैंने घबराकर पूछा।

"ये संतुलन के रक्षक हैं," उसने कहा। "इनका काम अलग-अलग दुनियाओं को एक-दूसरे से अलग रखना है। अगर इन्हें पता चल जाए कि दो समान रूप एक ही जगह मौजूद हैं, तो वे दोनों को खत्म कर देते हैं।"

मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई।

अब मुझे समझ आ गया था कि मैं सिर्फ एक अजीब दुनिया में नहीं पहुंचा था।

मैं ऐसी सच्चाई के बीच फंस चुका था, जहां मेरा सबसे बड़ा दुश्मन शायद मेरा ही दूसरा रूप था... या फिर वह मेरी आखिरी उम्मीद।

और उसी क्षण मुझे एहसास हुआ कि इस समानांतर दुनिया में मेरा आना कोई दुर्घटना नहीं था।

किसी ने मुझे यहां बुलाया था।

लेकिन क्यों?

इस सवाल का जवाब मुझे जल्द ही मिलने वाला था... और वह जवाब मेरी कल्पना से कहीं ज्यादा भयावह था।

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