छह समुद्री यात्राएँ

  छह समुद्री यात्राएँ



समुद्र के किनारे बसे छोटे से शहर नीलपुर में एक लड़की रहती थी, जिसका नाम था तारा। नीलपुर कोई बहुत बड़ा शहर नहीं था, लेकिन वहां के लोगों की आंखों में समुद्र जितने बड़े सपने रहते थे। सुबह होते ही मछुआरों की नावें नीली लहरों पर दूर निकल जातीं, शाम होते ही बच्चे रेत पर घर बनाते, और रात को बूढ़े लोग समुद्र की ओर देखकर पुरानी कहानियां सुनाते। हर कहानी में कोई न कोई रहस्य होता—कभी जलपरी, कभी बोलने वाला कछुआ, कभी चांदनी से बना जहाज़, तो कभी ऐसी लहर जो इंसान की सबसे प्यारी याद वापस ला सकती थी।


तारा को बचपन से समुद्र से प्यार था। वह घंटों किनारे बैठकर लहरों की आवाज़ सुनती रहती। उसे लगता जैसे हर लहर कोई संदेश लेकर आती है, बस मन शांत होना चाहिए उसे सुनने के लिए। उसके नाना, जिन्हें सब कप्तान नीलकंठ कहते थे, एक समय बड़े समुद्री यात्री थे। उन्होंने दुनिया के कई समुद्र देखे थे—अरब सागर की सुनहरी हवाएं, बंगाल की खाड़ी के चंचल तूफान, हिंद महासागर की गहराइयां, प्रशांत महासागर के रहस्यमय द्वीप, अटलांटिक की लंबी रातें और उत्तर के ठंडे जल जहां आकाश खुद पानी में उतर आता है।


लेकिन अब नाना बूढ़े हो चुके थे। उनकी सफेद दाढ़ी में नमक जैसे चमकते बाल थे और आंखों में वही पुराना समुद्र। उनके कमरे में एक लकड़ी की संदूक थी, जिस पर पीतल की पट्टियां लगी थीं। उस संदूक को घर में कोई नहीं खोलता था। नाना कहते, “कुछ चीजें तब तक बंद रहनी चाहिए जब तक समय उन्हें खोलने का इशारा न दे।”


एक दिन दोपहर को आसमान अचानक बैंगनी हो गया। हवा में नमक की जगह मीठी इलायची जैसी खुशबू फैल गई। समुद्र, जो रोज़ की तरह नीला रहता था, उस दिन हल्का चांदी जैसा चमकने लगा। तारा किनारे पर खड़ी थी। तभी एक लहर आई और उसके पैरों के पास एक छोटी सी सीपी छोड़ गई। वह सीपी साधारण नहीं थी। वह हर सांस के साथ रंग बदल रही थी—कभी हरी, कभी नीली, कभी गुलाबी, कभी सुनहरी।


तारा ने सीपी कान से लगाई। उसमें से समुद्र की आवाज़ नहीं, बल्कि किसी बच्चे की हंसी सुनाई दी। फिर एक धीमी आवाज़ आई, “छह यात्राएं पूरी करो, तारा। समुद्र की हंसी खो गई है।”


तारा घबरा गई। वह सीपी लेकर भागती हुई नाना के पास पहुंची। नाना ने जैसे ही सीपी देखी, उनका चेहरा बदल गया। उनकी आंखों में चिंता और चमक दोनों आ गए।


“तो आखिरकार बुलावा आ ही गया,” नाना ने धीमे से कहा।


“किसका बुलावा?” तारा ने पूछा।


नाना ने संदूक की ओर देखा। “समुद्र का। बहुत पुराने समय में समुद्र केवल पानी नहीं था। वह जीवित था, हंसता था, गाता था, बच्चों से खेलता था, नावों को रास्ता दिखाता था। मगर धीरे-धीरे मनुष्य ने उसकी आवाज़ सुननी बंद कर दी। लालच बढ़ा, प्रदूषण बढ़ा, डर बढ़ा। समुद्र की हंसी छह हिस्सों में टूट गई और दुनिया के अलग-अलग समुद्रों में छिप गई। जब कोई सच्चे दिल वाला यात्री उन छह हंसियों को वापस लाएगा, तब समुद्र फिर से अपनी असली आवाज़ पाएगा।”


“लेकिन मैं?” तारा ने हैरानी से कहा। “मैं तो बस किनारे बैठकर लहरें गिनती हूं।”


नाना मुस्कुराए। “जो लहरें गिन सकता है, वह रास्ते भी समझ सकता है।”


नाना ने संदूक खोली। अंदर एक छोटा कंपास था, लेकिन उसमें उत्तर-दक्षिण नहीं लिखा था। उसकी सुई रंग-बिरंगी थी और हर पल घूमती रहती थी। उसके साथ एक पुराना नक्शा था जो कागज़ पर नहीं, बल्कि पतली चमकती समुद्री त्वचा जैसी चीज़ पर बना था। नक्शे में छह गोल निशान थे। हर निशान पर एक प्रतीक बना था—हंसती सीपी, नाचती नाव, बोलता मोती, चांद का महल, उल्टा द्वीप और स्मृतियों का भंवर।


“यह रंगपंख कंपास है,” नाना ने कहा। “यह जगह नहीं दिखाता, यह दिल का रास्ता दिखाता है। जहां तुम्हारे मन को जाना चाहिए, यह वहीं मुड़ेगा।”


तारा के साथ कौन जाता? नाना बूढ़े थे। तारा अकेली नहीं जा सकती थी। तभी खिड़की से एक हरा तोता उड़कर अंदर आया और सीधे नाना की टोपी पर बैठ गया। उसका नाम था गप्पू। वह नाना का पुराना साथी था। गप्पू बोलता भी था, गाता भी था और कभी-कभी इतना झूठ बोलता कि खुद हंसते-हंसते गिर पड़ता।


“मैं चलूंगा!” गप्पू चिल्लाया। “मुझे समुद्र से पुराना हिसाब लेना है। पिछली बार उसने मेरी मूंगफली भिगो दी थी।”


नाना हंसे। “गप्पू, तुम रास्ते भर शोर मचाओगे।”


“शोर नहीं, मनोरंजन!” गप्पू ने गर्व से कहा।


शाम तक नाना ने पुरानी नाव तैयार कर दी। नाव का नाम था “नीली हंसी।” वह छोटी दिखती थी, लेकिन नाना ने बताया कि जब वह जादुई समुद्र में उतरेगी तो अपने आप फैल जाएगी। नाव की लकड़ी पर चांदी की लकीरें थीं और उसके पाल पर एक मुस्कुराती लहर बनी थी।


रात को जब पूरा नीलपुर सो गया, तारा, गप्पू और नाना नाव तक आए। नाना ने तारा के माथे पर हाथ रखा। “याद रखना, समुद्र को जीतना नहीं होता। उसे समझना होता है। हर यात्रा में तुम्हें कोई चीज़ मिलेगी, लेकिन उससे पहले तुमसे कुछ मांगा जाएगा—हिम्मत, करुणा, बुद्धि, हंसी, स्मृति या त्याग।”


तारा की आंखें नम हो गईं। “नाना, क्या मैं लौट आऊंगी?”


नाना ने समुद्र की ओर देखा। “जो अपने डर को साथ लेकर भी आगे बढ़ता है, वह लौटता जरूर है—बस पहले जैसा नहीं रहता।”


नाव लहरों पर उतरी। रंगपंख कंपास ने घूमते-घूमते पहली दिशा पकड़ी। हवा में केसर, काली मिर्च और नमक की खुशबू मिली। गप्पू ने घोषणा की, “यात्रा नंबर एक! अरब सागर की ओर! कृपया अपनी टोपी बांध लें, अपनी मूंगफली छिपा लें और डर को नाव से बाहर फेंक दें!”


तारा हंस पड़ी। नीली हंसी नाव चांदनी में आगे बढ़ गई।


पहली यात्रा अरब सागर में शुरू हुई। यहां पानी दिन में नीला और रात में सुनहरा दिखता था। लहरों पर ऐसी चमक थी जैसे हजारों छोटे दीपक पानी के अंदर जल रहे हों। दूर-दूर तक मसालों की खुशबू उड़ती थी। कभी दालचीनी, कभी लौंग, कभी इलायची, कभी काली मिर्च। गप्पू हर खुशबू पर अनुमान लगाता, “यह तो पायसम है! नहीं, यह बिरयानी है! नहीं, यह किसी मोटे रसोइए की जेब है!”


तीसरे दिन उन्हें एक अजीब द्वीप दिखाई दिया। द्वीप पर कोई पेड़ सीधा नहीं था। सारे पेड़ हंसते हुए झुके हुए लगते थे। उनके तनों पर आंखें थीं और पत्तियां ताली बजाती थीं। द्वीप के बीच एक ऊंचा प्रकाशस्तंभ था, लेकिन उससे रोशनी नहीं, हंसी निकल रही थी—कभी बच्चे जैसी, कभी बूढ़े जैसी, कभी बकरी जैसी, कभी किसी के छींकने जैसी।


“यह हंसती मीनार होगी,” तारा ने कहा।


जैसे ही नाव किनारे लगी, रेत ने गुदगुदी करनी शुरू कर दी। तारा पैर टिकाती तो रेत खिलखिलाती। गप्पू तो उछल-उछलकर चिल्लाने लगा, “बचाओ! मेरे पंजे पर किसी ने मज़ाक किया!”


द्वीप पर उन्हें एक छोटा केकड़ा मिला। उसका नाम था लालटू। वह लाल रंग का था, मूंछें रखता था और अपनी दो कैंचियों से हमेशा ताल देता रहता था। उसने कहा, “स्वागत है! लेकिन हंसती मीनार के अंदर जाने से पहले तुम्हें ‘बिना हंसे पुल’ पार करना होगा।”


“बिना हंसे पुल?” तारा ने पूछा।


लालटू उन्हें एक लकड़ी के पुल पर ले गया। पुल के नीचे पानी नहीं, बल्कि बुलबुलों का तालाब था। हर बुलबुले में कोई मज़ेदार चेहरा बनता और फूटते ही आवाज़ निकालता—“छीं!”, “धप्प!”, “मैं आलू हूं!”, “मेरी मूंछ कहां गई?”


लालटू ने नियम बताया, “जो पुल पार करते समय हंसा, वह बुलबुला बन जाएगा और तब तक फूटता रहेगा जब तक कोई उसे गंभीर कविता न सुनाए।”


गप्पू ने तुरंत कहा, “मैं तो गया!”


तारा ने होंठ दबाए। वह पुल पर चली। पहला बुलबुला फूटा—उसमें नाना जैसा चेहरा था, लेकिन दाढ़ी में मछलियां लटकी थीं। तारा का मन हंसने को हुआ पर उसने खुद को संभाला। दूसरा बुलबुला फूटा—गप्पू की आवाज़ आई, “मैं महान समुद्री सम्राट हूं, मेरी सेना में चार मूंगफली और आधा पापड़ है!” गप्पू खुद हंसने लगा, लेकिन लालटू ने उसकी चोंच पकड़ ली।


तीसरा बुलबुला सबसे कठिन था। उसमें तारा खुद दिखाई दी, लेकिन वह समुद्री घोड़े पर उल्टा बैठी थी और बहुत गंभीर चेहरा बनाकर कह रही थी, “मैं विश्व की सबसे बहादुर उल्टी यात्री हूं।” तारा की आंखों में पानी आ गया, पर वह हंसी नहीं।


पुल पार होते ही मीनार का दरवाजा खुल गया। अंदर गोल सीढ़ियां थीं। दीवारों पर पुराने नाविकों के मज़ेदार चित्र बने थे। कोई तूफान में भी बाल संवार रहा था, कोई मछली से शतरंज खेल रहा था, कोई जलपरी से झगड़ रहा था कि गाना बेसुरा है।


ऊपर पहुंचकर तारा ने देखा कि मीनार के केंद्र में एक पारदर्शी सीपी रखी है। उसमें हंसी का पहला टुकड़ा बंद था। वह रोशनी की तरह चमक रहा था। मगर उसके पास एक बूढ़ा समुद्री जिन्न बैठा था। उसकी दाढ़ी फेन जैसी थी और आंखें दो नमक के क्रिस्टल जैसी।


“जो हंसी लेना चाहता है,” जिन्न ने कहा, “उसे बताना होगा कि हंसी सबसे ज्यादा कब जरूरी होती है।”


गप्पू बोला, “जब कोई केले के छिलके पर फिसले!”


लालटू बोला, “जब मेरी मूंछें बारिश में सीधी हो जाएं!”


तारा ने कुछ देर सोचा। फिर बोली, “हंसी तब सबसे जरूरी होती है जब डर बहुत बड़ा लगने लगे। जब हम रोना चाहते हैं, लेकिन टूटना नहीं चाहते। जब रास्ता कठिन हो और हमें याद रखना हो कि हम अभी भी जीवित हैं।”


जिन्न मुस्कुराया। “सही कहा। हंसी मज़ाक नहीं, साहस की छोटी बहन है।”


सीपी खुल गई। उसमें से सुनहरी हंसी निकली और रंगपंख कंपास में समा गई। तभी मीनार से इतनी जोरदार खिलखिलाहट गूंजी कि पूरा द्वीप थरथरा गया। पेड़ों ने ताली बजाई, रेत ने कूदकर नाच किया और गप्पू ने घोषणा की, “पहली हंसी हमारी! अब सबको मुफ्त मूंगफली मिलनी चाहिए!”


लालटू ने तारा से कहा, “मैं भी साथ चलूंगा। इस द्वीप पर सब हंसते हैं, लेकिन कोई मेरी गंभीरता नहीं समझता।”


“तुम गंभीर हो?” गप्पू ने पूछा।


लालटू ने अपनी मूंछें तानकर कहा, “बहुत। मैं हर सुबह पांच मिनट तक गंभीरता से बुलबुले गिनता हूं।”


इस तरह लालटू भी नाव पर आ गया। नीली हंसी ने फिर पाल फैलाए और रंगपंख कंपास दूसरी दिशा में घूम गया। इस बार हवा में नमी ज्यादा थी, बादल नीचे झुके थे और लहरें चंचल थीं। गप्पू चिल्लाया, “यात्रा नंबर दो! बंगाल की खाड़ी! जहां बादल भी ढोल बजाते हैं!”


दूसरी यात्रा बंगाल की खाड़ी में थी। यहां समुद्र का स्वभाव बदलता रहता। सुबह वह शांत होता, दोपहर को चहकता, शाम को गुनगुनाता और रात को अचानक रहस्यमय हो जाता। बादल इतने नीचे आ जाते कि गप्पू उड़कर उन्हें चोंच से खुरच सकता था। कभी-कभी बादलों से पानी नहीं, रंगीन बूंदें गिरतीं। लालटू उन बूंदों को पकड़कर कहता, “यह तो नींबू स्वाद की बारिश है!” फिर एक बूंद चखकर मुंह बनाता, “नहीं, यह तो बादल का पसीना है।”


एक शाम उन्हें दूर से संगीत सुनाई दिया—ढोल, बांसुरी, शंख, सीटी, हंसी और कुछ ऐसी आवाज़ जैसे कोई विशाल बतख गीत गा रही हो। आगे बढ़ने पर उन्होंने देखा कि समुद्र के बीच एक तैरता हुआ मेला लगा था। नावें झूले बन गई थीं, मछलियां रंगीन लालटेन लेकर घूम रही थीं, डॉल्फिन हवा में छलांग लगाकर बच्चों को पीठ पर घुमा रही थीं, और एक बूढ़ा ऑक्टोपस आठ हाथों से एक साथ जलेबी तल रहा था।


“यह तो कमाल है!” तारा ने कहा।


“कमाल नहीं, धमाल!” गप्पू ने कहा और तुरंत एक तैरती जलेबी की ओर उड़ गया।


मेले का नाम था “लहरपुर उत्सव।” यहां हर साल समुद्र की सबसे खुशीभरी लहरें इकट्ठा होती थीं। लेकिन उस साल मेले में एक अजीब उदासी छिपी थी। लोग हंस रहे थे, पर उनकी हंसी आधी थी। झूले घूम रहे थे, पर उनमें चमक कम थी। जलेबी गोल थी, पर उसका बीच उदास था।


तारा ने एक छोटी डॉल्फिन से पूछा, “क्या हुआ?”


डॉल्फिन का नाम मिन्नी था। उसने कहा, “हमारे मेले का हंसी-मोती खो गया है। वह मोती हर खेल में आनंद भरता था। अब खेल चल तो रहे हैं, लेकिन खुशी पूरी नहीं आती। कहा जाता है कि मोती ‘तूफानी तमाशेबाज’ ने चुरा लिया है।”


“तूफानी तमाशेबाज कौन?” लालटू ने पूछा।


तभी आसमान में बिजली चमकी और बादलों से एक विशाल पतंग जैसी चीज़ उतरी। वह आधी नाव, आधी बादल और आधी ढोलक लगती थी। उस पर एक लंबा-पतला आदमी खड़ा था जिसकी मूंछें हवा में लहरा रही थीं। उसने टोपी पहनी थी जो हर बार छींकने पर रंग बदलती थी।


“मैं हूं तूफानी तमाशेबाज!” उसने घोषणा की। “हंसी-मोती मैंने चुराया नहीं, उधार लिया है। मेले वाले केवल पुराने खेल खेलते थे। मैंने सोचा थोड़ा तूफान डालूं, थोड़ा उल्टा-पुल्टा करूं!”


“तुमने सबकी खुशी आधी कर दी,” तारा ने कहा।


तमाशेबाज ने कंधे उचकाए। “अरे, खुशी बिना खतरे के कैसी? चलो, मुकाबला करते हैं। अगर तुम मेरे तीन तूफानी खेल जीत गईं, तो मोती तुम्हारा।”


पहला खेल था—बुलबुला नौका दौड़। तारा, गप्पू और लालटू को साबुन जैसे बड़े बुलबुले में बैठकर लहरों के ऊपर दौड़ना था। समस्या यह थी कि बुलबुला बहुत हल्का था और थोड़ी सी घबराहट से फूट सकता था। तारा ने सांस रोककर बुलबुले को संभाला। गप्पू चीखता रहा, “धीरे! तेज़! बाएं! दाएं! अरे मैं कप्तान हूं!” लालटू ने अपनी कैंचियों से संतुलन बनाया। बीच रास्ते एक विशाल मछली ने छींक मारी, हवा का झटका आया और बुलबुला ऊपर उछल गया। तारा ने आंखें बंद नहीं कीं। उसने बुलबुले को हवा के साथ बहने दिया, फिर धीरे से नीचे उतारा। वे जीत गए।


दूसरा खेल था—हंसती पहेलियां। एक कछुआ मंच पर आया और बोला, “ऐसी कौन सी चीज़ है जो समुद्र में रहती है पर कभी भीगती नहीं?” गप्पू ने कहा, “मेरी अक्ल!” कछुआ बोला, “गलत, क्योंकि वह तो है ही नहीं।” पूरा मेला हंस पड़ा। तारा ने सोचा और कहा, “समुद्र की कहानी। वह समुद्र में जन्म लेती है, लेकिन भीगती नहीं, लोगों के दिल में रहती है।” कछुए ने सिर हिलाया। “सही।”


तीसरा खेल सबसे कठिन था—तूफान को नचाना। तमाशेबाज ने बादलों को बुलाया। हवा तेज़ हुई। लहरें उठीं। उसने कहा, “तूफान से लड़ना नहीं। इसे नचाना है।”


तारा पहले डर गई। लहरें नावों को ऊपर-नीचे फेंक रही थीं। लोग चिल्ला रहे थे। लेकिन अचानक उसे नाना की बात याद आई—समुद्र को जीतना नहीं, समझना होता है। उसने लहरों की लय सुनी। वे बेकाबू नहीं थीं; उनमें एक ताल थी। धड़ाम, सर्र, थप, धड़ाम, सर्र, थप। तारा ने उसी ताल पर ताली बजाई। लालटू ने कैंचियों से ताल मिलाई। गप्पू ने बेसुरा गीत शुरू किया—


“लहर जी लहर, मत करो कहर,

नाचो ज़रा बनकर शहर!”


पहले तो सब हंसे, फिर डॉल्फिनें ताल देने लगीं, मछलियां गोल घूमने लगीं, बादल ढोल बजाने लगे। तूफान धीरे-धीरे नृत्य में बदल गया। लहरें अब मार नहीं रहीं थीं, झूम रही थीं। तमाशेबाज आश्चर्य से देखता रहा। अंत में उसने टोपी उतारकर झुकते हुए कहा, “मैं हार गया। तुमने तूफान से झगड़ा नहीं किया, उसे दोस्त बना लिया।”


उसने हंसी-मोती तारा को दे दिया। मोती गुलाबी था और उसमें छोटे-छोटे मेले घूमते दिखते थे। जैसे ही मोती रंगपंख कंपास में समाया, पूरा लहरपुर उत्सव चमक उठा। जलेबी का स्वाद वापस आ गया, झूले आकाश तक घूमने लगे, और बूढ़े ऑक्टोपस ने खुशी में आठों हाथों से इतनी जलेबियां उछालीं कि गप्पू ने अपनी चोंच में तीन पकड़ लीं।


मिन्नी डॉल्फिन ने तारा से कहा, “दूसरी हंसी आनंद की थी। याद रखना, खेल केवल समय बिताने के लिए नहीं होते। वे डर को हल्का और जीवन को रंगीन करते हैं।”


तारा ने समुद्र की ओर देखा। अब दो हंसियां रंगपंख में चमक रही थीं। उसे लगा जैसे समुद्र की आवाज़ थोड़ी साफ़ होने लगी है।


तीसरी यात्रा उन्हें अंडमान सागर की ओर ले गई। यहां पानी इतना साफ़ था कि नीचे रंगीन मूंगे, नीली मछलियां, चांदी की रेत और समुद्री फूल दिखते थे। रात को पानी में लाखों चमकीले जीव तैरते और लगता जैसे तारों का आकाश उल्टा होकर समुद्र में उतर आया हो।


तीसरे दिन रंगपंख कंपास अचानक नीचे की ओर इशारा करने लगा।


“नीचे?” तारा ने पूछा। “हम पानी के भीतर कैसे जाएंगे?”


तभी एक विशाल कछुआ पानी से निकला। उसकी पीठ पर छोटा-सा बगीचा था—समुद्री घास, गुलाबी फूल और मोती जैसे फल। उसने गंभीर आवाज़ में कहा, “मैं ग्रंथकच्छप हूं। समुद्र की तीसरी हंसी ज्ञान में छिपी है। उसे पाने के लिए तुम्हें जल-पुस्तकालय जाना होगा।”


“पुस्तकालय?” गप्पू ने घबराकर कहा। “जहां लोग चुप रहते हैं? यह तो मेरे खिलाफ साजिश है!”


कछुए ने अपनी नाक से तीन बुलबुले छोड़े। वे बुलबुले तारा, गप्पू और लालटू के सिर के चारों ओर पारदर्शी घेरों की तरह जम गए। “इनसे तुम पानी के भीतर सांस ले सकोगे।”


वे कछुए की पीठ पर बैठे और समुद्र के नीचे उतर गए। नीचे की दुनिया अद्भुत थी। मूंगे महलों जैसे थे, समुद्री घोड़े डाकिया बनकर चिट्ठियां ले जा रहे थे, सीपियां अपने मोती धूप में सुखा रही थीं, और छोटी मछलियां स्कूल की वर्दी पहनकर कतार में तैर रही थीं। गप्पू ने एक मछली से पूछा, “होमवर्क किया?” मछली बोली, “हां, विषय था—इंसान पानी में इतने अजीब क्यों दिखते हैं।”


जल-पुस्तकालय मूंगों से बना था। उसकी दीवारें किताबों से नहीं, सीपियों से भरी थीं। हर सीपी एक कहानी रखती थी। जब कोई सीपी खोलता, तो अक्षर नहीं, पूरा दृश्य पानी में तैरने लगता। कहीं प्राचीन नाविक तूफान से बच रहा था, कहीं एक बच्चा पहली बार सीप उठाता था, कहीं जलपरी चांद को गीत सुना रही थी।


पुस्तकालय की रक्षक थीं—नीलवाणी जलपरी। उनके बाल समुद्री शैवाल जैसे लंबे थे और आंखें गहरे पानी जैसी शांत। उन्होंने कहा, “तीसरी हंसी बोलते मोती में है। लेकिन वह मोती केवल उस यात्री को मिलेगा जो जानता हो कि ज्ञान का सही उपयोग क्या है।”


“सही उपयोग?” तारा ने पूछा।


नीलवाणी ने उन्हें एक बड़े कक्ष में ले जाकर तीन सीपियां दिखाईं। “पहली सीपी में वह ज्ञान है जिससे सोना बनाया जा सकता है। दूसरी में वह ज्ञान है जिससे समुद्री तूफानों को रोका जा सकता है। तीसरी में वह ज्ञान है जिससे हर जीव की भाषा समझी जा सकती है। तुम केवल एक सीपी खोल सकती हो। उसी से तय होगा कि तुम बोलते मोती की अधिकारी हो या नहीं।”


गप्पू ने तुरंत कहा, “सोना! सोना लेकर हम मूंगफली के पहाड़ खरीदेंगे!”


लालटू ने कहा, “तूफान रोकना अच्छा है। तब मेरी मूंछें कभी खराब नहीं होंगी।”


तारा चुप रही। सोना लोगों को लालची बना सकता था। तूफान रोकना अच्छा लगता था, लेकिन नाना ने कहा था कि समुद्र को समझना होता है, नियंत्रित नहीं करना। तीसरी सीपी—हर जीव की भाषा समझना—शायद सबसे साधारण लगे, पर उससे दोस्ती हो सकती थी, मदद हो सकती थी, गलतफहमियां मिट सकती थीं।


तारा ने तीसरी सीपी खोली।


तुरंत पानी में हजारों आवाजें गूंज उठीं। मछलियां क्या कह रही थीं, मूंगे क्या सोच रहे थे, सीपियां क्यों गुनगुना रही थीं—सब सुनाई देने लगा। एक छोटी मछली कह रही थी, “ऊपर के लोग हमारा घर गंदा क्यों करते हैं?” एक बूढ़ा मूंगा कह रहा था, “हमें समय चाहिए, शांति चाहिए।” एक शार्क दूर से कह रही थी, “सब मुझे डरावना समझते हैं, पर मेरे भी दांतों में दर्द होता है।”


गप्पू ने शार्क की बात सुनकर हंसते हुए कहा, “दांतों के डॉक्टर को बुलाओ!”


नीलवाणी मुस्कुराईं। “तुमने सही सीपी चुनी। ज्ञान का सबसे बड़ा काम है संबंध बनाना, केवल शक्ति पाना नहीं।”


उन्होंने एक मोती निकाला। वह बोल रहा था, लेकिन शब्दों में नहीं—छोटे-छोटे सुरों में। जब तारा ने उसे हाथ में लिया, तो उसे समुद्र की कई भाषाएं सुनाई दीं। मोती रंगपंख कंपास में समा गया। अब तीसरी हंसी भी जाग उठी।


लेकिन तभी पुस्तकालय के बाहर हलचल हुई। एक काली छाया मूंगों के ऊपर फैलने लगी। नीलवाणी का चेहरा गंभीर हो गया। “यह भूल-मछली है। यह उन बातों को खा जाती है जिन्हें लोग याद रखना चाहिए। अगर यह पुस्तकालय तक पहुंची, तो समुद्र की पुरानी कहानियां मिट जाएंगी।”


तारा बाहर दौड़ी। उसने देखा एक विशाल अंधेरी मछली, जिसके शरीर पर धुएं जैसी परत थी, धीरे-धीरे सीपियों की ओर बढ़ रही थी। उसके आसपास जाते ही छोटे जीव भूलने लगे कि वे कौन हैं। एक समुद्री घोड़ा अपना रास्ता भूल गया, एक मछली तैरना भूलकर उल्टी घूमने लगी।


तारा ने तीसरी सीपी से मिली भाषा की शक्ति का उपयोग किया। उसने भूल-मछली की भाषा सुनने की कोशिश की। अंधेरे के भीतर से बहुत धीमी आवाज़ आई—“मुझे किसी ने याद नहीं रखा। मैं सबकी भूली हुई कहानियां खाती हूं क्योंकि मेरी अपनी कहानी कोई नहीं सुनता।”


तारा को दया आई। उसने चिल्लाकर कहा, “रुको! मैं तुम्हारी कहानी सुनूंगी।”


भूल-मछली रुक गई। उसकी आंखें अंधेरे में दो फीकी रोशनी जैसी थीं।


“तुम कौन हो?” तारा ने पूछा।


मछली ने बताया कि वह कभी स्मृति-रक्षक थी। उसका काम खोई हुई कहानियां संभालना था। लेकिन जब लोगों ने पुराने समुद्री गीत गाना बंद कर दिया, जब बच्चों ने दादा-दादी की कहानियां सुनना बंद कर दिया, जब नाविकों ने सितारों से बात करना छोड़ दिया, तो वह अकेली रह गई। धीरे-धीरे उसका दुख भूख बन गया।


तारा ने नीलवाणी से कहा, “क्या पुस्तकालय में इसके लिए जगह है?”


नीलवाणी ने सिर झुकाया। “हर भूली कहानी के लिए यहां जगह है।”


भूल-मछली का अंधेरा थोड़ा हल्का हुआ। वह पुस्तकालय की रक्षक बन गई, ताकि कोई कहानी फिर कभी खो न जाए। तारा ने समझा कि ज्ञान केवल किताबों में नहीं, उन जीवों की पीड़ा सुनने में भी है जिन्हें दुनिया गलत समझती है।


चौथी यात्रा शुरू हुई तो समुद्र गहरा और विशाल होता गया। नीली हंसी नाव हिंद महासागर के खुले विस्तार में थी। यहां कई दिनों तक कोई जमीन नहीं दिखी। दिन में सूरज पानी पर सोने की सड़क बनाता और रात को चांद एक सफेद दरवाजे जैसा लगता। हवा शांत थी, पर उस शांति में गहराई थी।


एक रात चांद अचानक बहुत बड़ा हो गया। उसकी रोशनी सीधी समुद्र पर पड़ी और पानी में एक सीढ़ी बन गई—चांदी की, चमकती हुई, लहरों से बनी। रंगपंख कंपास उसी सीढ़ी की ओर इशारा कर रहा था।


गप्पू ने आंखें फाड़कर कहा, “क्या हम चांद पर जा रहे हैं? मैंने अपने पंखों की सर्विस नहीं कराई!”


लालटू ने मूंछों पर हाथ फेरा। “मैं चांद पर भी गंभीर रहूंगा।”


नाव सीढ़ी पर चढ़ने लगी। पानी सख्त नहीं हुआ था, फिर भी नाव डूब नहीं रही थी। वह चांदनी की राह पर ऊपर उठती गई। नीचे समुद्र छोटा, फिर विशाल दर्पण जैसा दिखने लगा। ऊपर उन्हें एक महल दिखाई दिया, जो पूरा चांदनी से बना था। उसकी दीवारें पारदर्शी थीं, खिड़कियों में तारों की जालियां थीं, और दरवाजे पर दो चांद-मछलियां पहरा दे रही थीं।


महल में उनका स्वागत राजकुमारी शशिप्रभा ने किया। वह मनुष्य जैसी थीं, पर उनके पैरों की जगह हल्की धुंध थी और उनके बालों में छोटे-छोटे तारे अटके थे। उन्होंने कहा, “चौथी हंसी कल्पना की है। बिना कल्पना के समुद्र केवल पानी रह जाता है, यात्रा केवल दूरी, और जीवन केवल दिन गिनना।”


महल में कई कक्ष थे। एक कक्ष में सपनों की पतंगें उड़ती थीं। दूसरे में बादलों के खिलौने बनते थे। तीसरे में वे चित्र रखे थे जो अभी किसी ने बनाए ही नहीं थे। चौथे में अधूरी कहानियां सोती थीं और कभी-कभी करवट बदलते हुए नए पात्र जन्म देती थीं।


शशिप्रभा उन्हें एक बड़े सभागार में ले गईं। बीच में एक खाली सिंहासन था। “यह कल्पना-रंगमंच है। यहां जो कहानी कही जाती है, वह थोड़ी देर के लिए सच हो जाती है। लेकिन चौथी हंसी पाने के लिए तुम्हें ऐसी कहानी बनानी होगी जिसमें कोई राजा युद्ध जीतकर नहीं, बल्कि किसी की उदासी समझकर महान बने।”


तारा ने सोचा। गप्पू ने सुझाव दिया, “राजा मूंगफली राज्य का हो और दुश्मन काजू हों।”


लालटू ने कहा, “और एक गंभीर केकड़ा मंत्री हो।”


तारा मुस्कुराई। उसने आंखें बंद कीं और कहानी कहना शुरू किया।


“एक राज्य था, जहां राजा के पास बहुत बड़ी सेना थी, पर राज्य के लोग हंसते नहीं थे। राजा ने सोचा कि शायद पड़ोसी राज्य ने हंसी चुरा ली है। उसने युद्ध की तैयारी कर ली। लेकिन युद्ध से पहले एक छोटी लड़की ने राजा से पूछा—आपने अपने लोगों से पूछा भी है कि वे दुखी क्यों हैं? राजा पहली बार महल से बाहर निकला। उसने देखा कि बच्चों के खेल के मैदान पर सैनिकों ने अभ्यास शुरू कर दिया था, किसानों के गीत करों के बोझ में दब गए थे, और बूढ़ों की कहानियां सुनने वाला कोई नहीं था। राजा ने युद्ध रद्द कर दिया। उसने मैदान बच्चों को लौटाया, कर कम किए, रात को कहानी-संध्या शुरू की, और खुद सिंहासन से उतरकर लोगों के बीच बैठा। तब राज्य में हंसी वापस आई। राजा युद्ध जीतकर नहीं, सुनकर महान हुआ।”


जैसे ही तारा ने कहानी पूरी की, रंगमंच पर दृश्य सच हो गया। राजा, बच्चे, किसान, बूढ़े सब चांदनी के बने हुए दिखने लगे। फिर वे चमकती धूल बनकर हवा में घुल गए। शशिप्रभा की आंखों में चमक थी।


“तुमने समझा कि कल्पना भागना नहीं, दुनिया को बेहतर देखने का अभ्यास है,” उन्होंने कहा।


लेकिन उसी समय महल कांप उठा। एक काला बादल चांद के किनारे से उठकर महल पर छा गया। शशिप्रभा बोलीं, “यह निराशा-धुंध है। यह कल्पना को बेकार कहती है, सपनों को बचकाना बताती है, और लोगों को यकीन दिलाती है कि कुछ बदल नहीं सकता।”


धुंध सभागार में फैलने लगी। गप्पू ने उड़ने की कोशिश की, पर उसके पंख भारी हो गए। “मुझे लग रहा है मैं कभी मज़ेदार नहीं था,” वह उदास बोला।


लालटू ने मूंछें नीचे कर लीं। “शायद मेरी गंभीरता भी बेकार है।”


तारा को भी लगा कि उसकी यात्राएं मूर्खता हैं। वह कौन होती है समुद्र की हंसी बचाने वाली? शायद सब व्यर्थ है।


तभी उसने रंगपंख कंपास देखा। उसमें तीन हंसियां हल्की-हल्की चमक रही थीं। उसे अरब सागर की मीनार याद आई, बंगाल की खाड़ी का मेला, जल-पुस्तकालय की आवाजें। वे सब सच थीं। उसने खुद से कहा, “निराशा हमेशा अंतिम सच नहीं होती। वह बस धुंध है।”


तारा ने फिर कहानी कहना शुरू किया—इस बार अपने बारे में। उसने कहा, “एक लड़की थी जो डरती थी, पर नाव पर चढ़ी। उसे नहीं पता था कि वह सफल होगी या नहीं, पर उसने हर जगह किसी न किसी से दोस्ती की। उसने सीखा कि हंसी साहस है, आनंद तूफान को नचा सकता है, ज्ञान संबंध बनाता है, और कल्पना अंधेरे में रास्ता बनाती है।”


जैसे-जैसे वह बोलती गई, उसके शब्दों से छोटे दीपक बनने लगे। वे दीपक धुंध में घुस गए। गप्पू ने धीरे से कहा, “मैं मज़ेदार हूं। कभी-कभी जरूरत से ज्यादा, पर हूं।” लालटू ने मूंछें उठाईं। “मैं गंभीर हूं, और यह भी महत्वपूर्ण है।” धुंध पीछे हटने लगी। शशिप्रभा ने चांदनी का दीप जलाया और धुंध टूट गई।


चौथी हंसी एक चांदी के पंख के रूप में आई। वह रंगपंख कंपास में समा गई। अब कंपास की रोशनी और तेज़ हो गई।


पांचवीं यात्रा सबसे लंबी थी। नीली हंसी नाव कई दिनों तक पूर्व की ओर बढ़ती रही और अंततः विशाल प्रशांत महासागर में पहुंची। प्रशांत नाम शांत था, पर यह समुद्र बहुत विचित्र निकला। कभी लहरें बिल्कुल शांत, कभी अचानक पहाड़ जैसी ऊंची। कभी पानी में नीला रंग, कभी बैंगनी, कभी हरा। एक दिन तो सूर्योदय के समय पानी में इंद्रधनुष की धारियां बन गईं और गप्पू ने घोषणा की, “समुद्र ने आज पायजामा पहना है।”


प्रशांत महासागर में उन्हें उल्टा द्वीप ढूंढना था। नक्शे पर उसका प्रतीक था—एक द्वीप जो आकाश से लटक रहा था। कई दिन तक खोजने के बाद एक सुबह तारा ने देखा कि बादलों के बीच पेड़ उल्टे लटक रहे हैं। उनकी जड़ें ऊपर थीं और फल नीचे की ओर झूल रहे थे। द्वीप सचमुच आकाश में उल्टा था, और उसकी छाया समुद्र पर एक सामान्य द्वीप जैसी दिख रही थी।


“हम वहां कैसे जाएं?” तारा ने पूछा।


तभी बादलों से डॉल्फिन जैसी आकृतियां उतरीं। वे पानी की नहीं, बादल की बनी थीं। उनकी आंखें नीली बिजली जैसी थीं। एक बादल-डॉल्फिन ने कहा, “ऊपर जाने के लिए नीचे विश्वास छोड़ना होगा।”


गप्पू बोला, “मैं तो पहले ही बहुत चीजें छोड़ चुका हूं—संतुलन, शांति, और कभी-कभी शिष्टाचार।”


बादल-डॉल्फिन हंस पड़ी। उसने अपनी पीठ तारा के सामने झुका दी। तारा, गप्पू और लालटू उस पर बैठे। डॉल्फिन हवा में उछली और सीधे आकाश की ओर तैरने लगी। नीचे समुद्र छोटा होता गया, ऊपर उल्टा द्वीप बड़ा। जब वे द्वीप पर पहुंचे, तो समझ में आया कि वहां गुरुत्वाकर्षण का नियम थोड़ा शरारती था। कोई चीज़ नीचे गिरती तो ऊपर चली जाती, और ऊपर फेंको तो नीचे आ जाती। गप्पू ने एक फल तोड़ा, वह फल नीचे गिरने के बजाय ऊपर उड़ गया। गप्पू उसके पीछे उड़ते हुए बोला, “रुको! फल होने का मतलब यह नहीं कि तुम आज़ाद हो!”


द्वीप पर रहने वाले लोग भी अनोखे थे। वे सिर के बल नहीं चलते थे, बल्कि उनका मन उल्टा सोचता था। दुखी होने पर वे नाचते, खुश होने पर शांत बैठते, सवाल का जवाब सवाल से देते, और रास्ता पूछो तो कविता सुनाते। उनके राजा का नाम था उलटेश्वर, पर वह सिंहासन पर नहीं, झूले पर बैठता था। उसके दरबार में मंत्री पहेलियां पहनते थे और सैनिक तकिए लेकर चलते थे ताकि कोई गिरते हुए चोटिल न हो।


उलटेश्वर ने तारा का स्वागत करते हुए कहा, “जो सीधे रास्ते से यहां आया, वह गलत आया। जो भटककर आया, वही सही आया। तुम कौन हो?”


तारा ने कहा, “मैं समुद्र की हंसी ढूंढ रही हूं।”


राजा ने ताली बजाई। “अच्छा! तो तुम्हें पांचवीं हंसी चाहिए—आश्चर्य की हंसी। वह तब मिलती है जब मन मान ले कि दुनिया वैसी ही नहीं है जैसी हम हमेशा समझते आए हैं।”


राजा ने तारा को तीन उल्टे काम दिए। पहला—एक ऐसी मछली पकड़ो जो पानी में नहीं, हवा में तैरती हो। दूसरा—एक ऐसा गीत गाओ जिसे सुनकर कोई आवाज़ न हो, फिर भी सब सुनें। तीसरा—एक ऐसी गलती करो जिससे सबको फायदा हो।


तारा ने सोचा। हवा में तैरती मछली पकड़ना कठिन था, लेकिन उसने देखा कि बादलों में छोटी-छोटी पारदर्शी मछलियां तैर रही थीं। वे जाल से नहीं पकड़ी जा सकती थीं। तारा ने एक कटोरे में समुद्री पानी लिया और उसमें आकाश का प्रतिबिंब भर लिया। हवा-मछली प्रतिबिंब में तैरने लगी और कटोरे में उतर आई। पहला काम पूरा।


दूसरा काम—बिना आवाज़ का गीत। गप्पू को यह अपमान लगा। “गीत बिना आवाज़? यह तो पराठा बिना आलू!” लेकिन तारा ने आंखों से, हाथों से, मुस्कान से, सांसों की लय से गीत बनाया। उसने समुद्र की लहरों की चाल हाथों से दिखाई, तूफान का डर आंखों से, मेले की खुशी मुस्कान से, और चांदनी की शांति धीमे घूमकर। कोई आवाज़ नहीं थी, फिर भी सभी ने गीत महसूस किया। दूसरा काम पूरा।


तीसरा काम सबसे अजीब था—ऐसी गलती जिससे सबको फायदा हो। तारा उलझ गई। गलती तो गलती होती है। फायदा कैसे? तभी गप्पू ने एक चमकीला फल चुराने की कोशिश की। वह फल हाथ से छूटा और ऊपर उड़ता हुआ द्वीप के बीच लगे विशाल पानी-घड़े से टकरा गया। घड़ा टूट गया और बादल-पानी चारों ओर फैल गया। पहले सब घबरा गए। लेकिन फिर देखा कि द्वीप के सूखे पेड़ हरे होने लगे। उलटेश्वर हंस पड़ा। “यह रही गलती! चोरी की कोशिश गलत, फल छूटना गलती, घड़ा टूटना दुर्घटना—पर सूखे पेड़ बच गए। कभी-कभी गलती हमें बताती है कि कहां पानी चाहिए।”


गप्पू ने गर्व से कहा, “तो मैं महान गलतीकार हूं!”


राजा ने पांचवीं हंसी दी। वह एक छोटा इंद्रधनुषी बुलबुला था, जिसमें हर पल नया दृश्य बनता था—कभी उड़ती मछली, कभी उल्टा पेड़, कभी बादल-डॉल्फिन। बुलबुला रंगपंख कंपास में समा गया।


लेकिन जैसे ही वे लौटने लगे, द्वीप अचानक हिलने लगा। उसकी जड़ें बादलों से छूट रही थीं। उलटेश्वर घबरा गया। “हमारा द्वीप नीचे गिर जाएगा!”


तारा ने पूछा, “ऐसा क्यों हो रहा है?”


राजा बोला, “हमने वर्षों से नीचे समुद्र को धन्यवाद नहीं दिया। हम ऊपर रहने लगे और भूल गए कि हमारी छाया भी पानी पर टिकी है। द्वीप का संतुलन टूट गया।”


तारा ने बादल-डॉल्फिनों से मदद मांगी। उसने नीचे समुद्र की ओर देखा और तीसरी यात्रा में सीखी भाषाओं की शक्ति से समुद्र से बात की। “हे समुद्र, क्या तुम इस द्वीप को संभालोगे?”


समुद्र की गहरी आवाज़ आई, “जो ऊपर रहते हैं, उन्हें नीचे का सम्मान करना होगा।”


तारा ने उलटेश्वर से कहा, “हर वर्ष तुम्हें समुद्र उत्सव मनाना होगा। अपने बादल-पानी का हिस्सा नीचे भेजना होगा, और समुद्र से मिली भाप का सम्मान करना होगा।”


राजा ने वचन दिया। द्वीप की जड़ें फिर बादलों में जम गईं। तारा ने समझा कि आश्चर्य अच्छा है, पर विस्मय के साथ विनम्रता भी चाहिए। जो बहुत ऊपर उड़ता है, उसे याद रखना चाहिए कि उसकी शुरुआत कहीं नीचे से हुई है।


छठी यात्रा शुरू होते ही समुद्र का रंग बदल गया। रंगपंख कंपास अब सबसे दूर, सबसे गहरे, सबसे अजीब रास्ते की ओर इशारा कर रहा था। नीली हंसी नाव पश्चिम की ओर बढ़ी और लंबे सफर के बाद अटलांटिक महासागर में पहुंची। यहां लहरों में एक गंभीर संगीत था। दिन में पानी स्टील जैसा चमकता, रात में वह काला रेशम लगता। कभी-कभी दूर बर्फ जैसे सफेद पक्षी उड़ते, कभी विशाल व्हेल की आवाज़ पानी के अंदर से आती और पूरी नाव धीमे से कांप जाती।


अटलांटिक में कई पुराने जहाज़ों की कहानियां थीं। कुछ लौटे, कुछ खो गए, कुछ किंवदंती बन गए। तारा को महसूस हुआ कि यह समुद्र बाकी समुद्रों की तरह चंचल नहीं, बल्कि स्मृतियों से भरा है। यहां हर लहर जैसे किसी बीते हुए यात्री का नाम जानती थी।


एक रात घना कोहरा छा गया। नाव आगे बढ़ती रही, पर दिशा दिखनी बंद हो गई। रंगपंख कंपास की रोशनी धीमी पड़ने लगी। अचानक सामने एक विशाल भंवर दिखाई दिया। वह सामान्य भंवर नहीं था। उसका पानी गोल-गोल घूमते हुए चित्र दिखा रहा था—कभी तारा का बचपन, कभी नाना की जवान उम्र, कभी गप्पू का छोटा रूप, कभी लालटू का हंसता द्वीप। भंवर के ऊपर धुंध से बने अक्षर चमके—“स्मृति-सागर।”


तारा ने नक्शा देखा। आखिरी प्रतीक यही था—स्मृतियों का भंवर।


भंवर से एक आवाज़ आई, “छठी हंसी पाने के लिए तुम्हें अपनी सबसे प्यारी स्मृति छोड़नी होगी।”


तारा का दिल धड़क उठा। “छोड़नी होगी? हमेशा के लिए?”


“जो समुद्र की पूरी हंसी चाहता है, उसे समझना होगा कि स्मृति पकड़कर रखने की चीज़ नहीं, बांटकर जीवित रखने की चीज़ है।”


गप्पू डर गया। “मैं अपनी पहली मूंगफली की याद नहीं छोड़ सकता!”


लालटू ने मूंछें पकड़ लीं। “मैं अपनी पहली गंभीर सुबह नहीं छोड़ूंगा।”


तारा सोच में डूब गई। उसकी सबसे प्यारी स्मृति कौन सी थी? शायद वह दिन जब नाना ने पहली बार उसे नाव चलाना सिखाया था। वह छोटी थी, हवा तेज़ थी, वह डर गई थी। नाना ने उसके हाथ अपने हाथों में लेकर कहा था, “लहर को दुश्मन मत समझो। उसका हाथ पकड़ो।” उस दिन तारा ने पहली बार महसूस किया था कि समुद्र डरावना होने के साथ-साथ मित्र भी हो सकता है।


क्या वह स्मृति छोड़ दे? अगर वह याद ही न रही तो वह कौन रहेगी? उसकी यात्रा की जड़ ही तो वही थी।


भंवर ने उसे अंदर खींचना शुरू किया। नाव गोल-गोल घूमने लगी। धुंध घनी हो गई। तारा ने नाना की आवाज़ याद करने की कोशिश की, लेकिन आवाज़ धुंधली पड़ने लगी। वह घबरा गई। “नहीं! मैं यह याद नहीं खो सकती!”


तभी उसे जल-पुस्तकालय की भूल-मछली याद आई। भूली हुई कहानियां तब अंधेरा बन जाती हैं जब कोई उन्हें सुनता नहीं। शायद स्मृति छोड़ने का अर्थ भूलना नहीं, उसे अपने अंदर बंद रखने के बजाय दुनिया को देना है।


तारा ने आंखें बंद कीं और अपनी प्रिय स्मृति को शब्दों में कहना शुरू किया। उसने उस दिन का वर्णन किया—छोटी नाव, नाना के हाथ, नम हवा, डर, पहली मुस्कान, लहर का हाथ पकड़ना। जैसे-जैसे वह बोलती गई, स्मृति उसके मन से निकलकर रोशनी बन गई। वह रोशनी भंवर के ऊपर तैरने लगी। तारा को लगा कि स्मृति भीतर से गायब नहीं हुई, बल्कि बड़ी हो गई है। अब वह केवल उसकी नहीं थी; समुद्र की भी थी, गप्पू की भी, लालटू की भी, हर आने वाले यात्री की भी।


भंवर शांत होने लगा। उसमें से एक सफेद सीपी निकली। सीपी खुली तो उसमें कोई तेज़ हंसी नहीं थी, बल्कि बहुत शांत, बहुत गहरी मुस्कान थी। यह छठी हंसी थी—स्वीकार की हंसी। वह हंसी जो नुकसान के बाद भी जीवन को हां कहती है, बिछड़ने के बाद भी प्रेम को जीवित रखती है, डर के बाद भी यात्रा जारी रखती है।


लेकिन तभी भंवर के नीचे से एक विशाल अंधेरा उठा। वह समुद्री राक्षस जैसा था, पर उसका कोई निश्चित आकार नहीं था। कभी वह टूटा जहाज़ बनता, कभी काला तूफान, कभी मनुष्य की लालची आंखें, कभी प्लास्टिक से ढका समुद्र, कभी रोती व्हेल। उसकी आवाज़ भारी थी।


“तुमने छह हंसियां पा लीं,” वह बोला, “पर समुद्र को कौन बचाएगा? लोग फिर भूल जाएंगे। वे फिर गंदगी डालेंगे, फिर लालच करेंगे, फिर कहानियां बंद कर देंगे। हंसी लौटाकर क्या होगा?”


तारा चुप रही। यह प्रश्न कठिन था। वह झूठ नहीं बोल सकती थी कि सब तुरंत बदल जाएगा। वह दुनिया की सारी गलतियां अकेली ठीक नहीं कर सकती थी।


गप्पू भी पहली बार शांत था। लालटू की मूंछें झुकी थीं।


तारा ने धीरे से कहा, “मैं सब कुछ ठीक नहीं कर सकती। लेकिन मैं शुरू कर सकती हूं। मैं कहानी ले जाऊंगी। मैं बच्चों को सुनाऊंगी कि समुद्र जीवित है। मैं लोगों को बताऊंगी कि हर लहर एक घर है, हर मछली एक जीवन, हर सीपी एक स्मृति। शायद कुछ लोग हंसेंगे, कुछ नहीं मानेंगे, कुछ बदलेंगे। लेकिन हंसी का काम यही है—अंधेरे को एकदम खत्म करना नहीं, उसमें पहला दीया जलाना।”


अंधेरा कुछ देर चुप रहा। फिर बोला, “क्या तुम्हें विश्वास है कि कहानी दुनिया बदल सकती है?”


तारा ने उत्तर दिया, “कहानी पहले मन बदलती है। मन बदलता है तो हाथ बदलते हैं। हाथ बदलते हैं तो दुनिया।”


रंगपंख कंपास में छहों हंसियां एक साथ चमक उठीं—साहस, आनंद, ज्ञान, कल्पना, आश्चर्य और स्वीकार। रोशनी इतनी तेज़ हुई कि अंधेरा पीछे हटने लगा। राक्षस सिकुड़ता गया। वह पूरी तरह नष्ट नहीं हुआ, पर उसका आकार छोटा हो गया। वह समुद्र की गहराई में चला गया, जैसे चेतावनी कि अंधेरा हमेशा लौट सकता है अगर लोग भूल जाएं।


भंवर शांत हो गया। अटलांटिक की लहरों पर सुबह की पहली रोशनी फैल गई। तारा ने महसूस किया कि समुद्र की आवाज़ बदल रही है। दूर कहीं से हंसी आई—पहले धीमी, फिर गहरी, फिर विशाल। ऐसा लगा जैसे अरब सागर की मीनार, बंगाल का मेला, अंडमान का पुस्तकालय, चांद का महल, उल्टा द्वीप और स्मृति-सागर सब एक साथ हंस रहे हों।


नीली हंसी नाव अपने आप घर की ओर मुड़ गई। सफर लंबा था, पर अब लहरें रास्ता दिखा रही थीं। जहां-जहां नाव गुज़री, पानी थोड़ा साफ़ चमका। मछलियां ऊपर आईं, डॉल्फिनों ने छलांग लगाई, बादलों ने हल्की बारिश की, और रात को सितारे असाधारण रूप से पास दिखाई दिए।


जब तारा नीलपुर लौटी, सुबह हो रही थी। नाना समुद्र किनारे बैठे थे, जैसे उन्हें पता था कि वह आज आएगी। तारा दौड़कर उनसे लिपट गई। नाना ने कुछ नहीं पूछा। शायद यात्राओं के असली उत्तर चेहरे पर लिखे होते हैं।


गप्पू ने नाना की टोपी पर बैठते हुए कहा, “हमने छह समुद्रों को हंसा दिया, एक राक्षस को भाषण दिया, जलेबी खाई, चांद पर गए, और मैंने महान गलती करके एक द्वीप बचाया। कृपया इसे इतिहास में लिखा जाए।”


लालटू ने गंभीरता से कहा, “और मेरी मूंछों ने हर संकट में संतुलन बनाए रखा।”


नाना हंसे। “तुम सब बदलकर आए हो।”


तारा ने रंगपंख कंपास उन्हें दिया। अब उसमें सुई नहीं घूम रही थी। उसमें छह रंगों की रोशनी स्थिर होकर एक छोटी लहर का रूप ले चुकी थी।


नाना ने कहा, “अब समुद्र की हंसी वापस है, लेकिन कहानी को जीवित रखना तुम्हारा काम है।”


उस दिन से नीलपुर बदलने लगा। तारा ने बच्चों को समुद्र की कहानियां सुनानी शुरू कीं। पहले बच्चे हंसते, फिर सवाल पूछते, फिर समुद्र तट साफ़ करने आने लगे। मछुआरे पुराने गीत फिर गाने लगे। स्कूल में “समुद्र दिवस” मनाया जाने लगा, जहां बच्चे सीपियों की आवाज़ सुनते, कागज़ की नावों पर सपने लिखते, और सीखते कि पानी केवल संसाधन नहीं, रिश्ता है।


तारा ने छह यात्राओं को कभी राज़ नहीं बनाया। वह सबको बताती कि अरब सागर ने उसे सिखाया—डर में भी हंसी बचाकर रखो। बंगाल की खाड़ी ने सिखाया—आनंद तूफान को नचा सकता है। अंडमान की गहराइयों ने सिखाया—ज्ञान का असली अर्थ है दूसरों की भाषा सुनना। हिंद महासागर की चांदनी ने सिखाया—कल्पना अंधेरे में रास्ता बनाती है। प्रशांत के उल्टे द्वीप ने सिखाया—दुनिया को उल्टा देखकर भी विनम्र रहो। अटलांटिक के स्मृति-सागर ने सिखाया—सबसे प्यारी यादें बांटने से खोती नहीं, अमर होती हैं।


कई साल बाद तारा खुद एक प्रसिद्ध समुद्री कथाकार बनी। दूर-दूर से लोग नीलपुर आते और उससे छह यात्राओं की कहानी सुनते। कुछ लोग कहते यह केवल कल्पना है। कुछ कहते यह पुरानी लोककथा है। कुछ बच्चे कहते, “नहीं, यह सच है, क्योंकि हमने रात को समुद्र को हंसते सुना है।”


तारा हर बार मुस्कुराती। वह जानती थी कि सच हमेशा वही नहीं होता जिसे हाथ से पकड़ा जा सके। कुछ सच लहरों की तरह होते हैं—वे आते हैं, छूते हैं, लौट जाते हैं, पर उनके नमक की खुशबू देर तक रह जाती है।


एक शाम, जब तारा बड़ी हो चुकी थी, वही रंग बदलती सीपी फिर किनारे पर आई। उसके पास एक छोटा बच्चा खड़ा था, जिसकी आंखों में समुद्र जितना सवाल था। बच्चे ने सीपी कान से लगाई और चौंककर बोला, “दीदी, इसमें कोई हंस रहा है!”


तारा ने आकाश की ओर देखा। चांद पानी में उतर रहा था। हवा में हल्की इलायची, नमक और जलेबी जैसी मिली-जुली खुशबू थी। दूर कहीं गप्पू बूढ़ा होकर भी मूंगफली पर बहस कर रहा था। लालटू अपने बच्चों को गंभीरता से बुलबुले गिनना सिखा रहा था। नाना की पुरानी नाव किनारे पर शांत खड़ी थी, पर उसकी लकड़ी में अब भी चमक थी।


तारा ने बच्चे से कहा, “शायद समुद्र तुम्हें बुला रहा है।”


बच्चे ने डरते हुए पूछा, “क्या समुद्र डरावना है?”


तारा ने मुस्कुराकर उत्तर दिया, “हां, कभी-कभी। लेकिन वही तो मज़ा है। जो यात्रा थोड़ी डरावनी न हो, वह दिल को बड़ा कैसे बनाएगी?”


बच्चे ने पूछा, “क्या मैं लौट आऊंगा?”


तारा ने वही शब्द दोहराए जो कभी नाना ने उससे कहे थे, “जो अपने डर को साथ लेकर भी आगे बढ़ता है, वह लौटता जरूर है—बस पहले जैसा नहीं रहता।”


समुद्र ने उसी क्षण एक लंबी, गहरी, चमकदार हंसी हंसी। लहरें किनारे पर आईं और रेत पर छह छोटे निशान बना गईं—सीपी, मोती, पंख, बुलबुला, चांद और भंवर। फिर अगली लहर आई और निशान मिटा गई, जैसे कह रही हो—हर कहानी खत्म होकर भी अगली कहानी के लिए जगह बनाती है।


और इस तरह समुद्र की छह यात्राएं समाप्त नहीं हुईं। वे हर उस दिल में फिर शुरू हो गईं, जो लहरों की आवाज़ सुनते समय यह सोचता है कि शायद पानी के उस पार कोई हंसती मीनार है, कोई तैरता मेला है, कोई जल-पुस्तकालय है, कोई चांदनी महल है, कोई उल्टा द्वीप है, कोई स्मृति-सागर है—और शायद एक छोटी नाव आज भी किसी साहसी यात्री का इंतज़ार कर रही है।


क्योंकि समुद्र केवल रास्ता नहीं देता। वह मनुष्य को अपने भीतर उतरना सिखाता है। उसकी हर लहर पूछती है—क्या तुम सुन रहे हो? उसकी हर गहराई कहती है—क्या तुम समझ रहे हो? और उसकी हर हंसी याद दिलाती है कि दुनिया में जादू खत्म नहीं हुआ; बस उसे देखने के लिए आंखों में थोड़ा भरोसा, दिल में थोड़ी करुणा और यात्रा पर निकलने की थोड़ी हिम्मत चाहिए।


टिप्पणियाँ